विस्मृति एक वरदान है:”जब भूलना बन जाए जीवन का वरदान या कहें कि मन की शांति का रहस्य”

जी हां ! विस्मृति, यानी कि भूलना, एक वरदान ही तो है । अब आप ये सोच रहे होंगे कि भला भूलने की बीमारी वरदान कैसे हुई ?
आज के दौर में तो भूलना एक आम-सी आदत बन गया है । बच्चे पढ़ा हुआ भूल जाते हैं, तो बुजुर्ग अपना चश्मा । कहीं मम्मी गैस पे दूध रख कर भूल जाती हैं, तो कहीं पापा ऑफिस के लिए निकलते हुए गाड़ी की चाभियां । कभी बिजली के बिल की तारीख दिमाग से निकल जाती है, तो कभी स्कूल कॉलेज में मिला हुआ कोई प्रोजेक्ट । किसी के बर्थडे और एनिवर्सरी की तारीखें याद रखने का जिम्मा भी अब तो फोन को ही दे दिया गया है । फोन से याद आया, एक ज़माना था जब दूर दूर के सगे संबंधियों के फोन नंबर भी लोगों को याद रहते थे, पर अब तो अपने नंबर के अलावा अपने ही परिवार के चार लोगों के भी नंबर याद रह जाएं तो बहुत बड़ी बात है । कुल मिलाकर, भूलना आजकल बहुत ही आम हो गया है ।
अब आप सोचेंगे कि मैंने भूलने की आदत को वरदान क्यों कहा ? तो ज़रा सोचिए, कितना अच्छा होता अगर हम अपने जीवन की हर बुरी घटना को भुला पाते । कितनी शांति होती हमारे जीवन में, अगर लोगों के तानों को याददाश्त से मिटा पाना मुमकिन होता । शायद अगर ये विस्मृति का वरदान द्वापर युग और त्रेता युग के लोगों को मिला होता, तो ना तो राम रावण का युद्ध होता, और ना ही महाभारत होती ।


कहते हैं कि महाभारत में जब युधिष्ठिर का राज्याभिषेक होने वाला था तो उसमें शामिल होने के लिए दुर्योधन भी इंद्रप्रस्थ पहुंचा । किंतु वह अंदर आते हुए महल में बने एक मायावी कुंड में गिर पड़ा । द्रौपदी ने यह देख कर उसे “अंधे का पुत्र अंधा” कहकर उसका मज़ाक उड़ाया । कहा जाता है कि इस घटना का बदला लेने के लिए ही दुर्योधन ने भरी सभा में द्रौपदी के चीरहरण की चाल चली । यदि दुर्योधन के पास विस्मृति की शक्ति होती, तो वह अपने अपमान को भूल जाता और फलस्वरूप एक अन्याय होने से बच जाता ।

इसी प्रकार जब श्री राम, माता सीता और भाई लक्ष्मण के साथ वनवास में थे, तब शूर्पणखा ने क्रमशः श्री राम और लक्ष्मण दोनों से विवाह का प्रस्ताव रखा, जिसे दोनों ने अस्वीकार कर दिया । जब उसने मां सीता पर आक्रमण करने का प्रयास किया, तब लक्ष्मण ने उसकी नाक काट दी । वह रोते रोते अपने भाई रावण के पास गई और उसे सारा किस्सा कह सुनाया । इससे पहले माता सीता के स्वयंवर के समय भी रावण को अपमान का सामना करना पड़ा था, क्यूंकि वह शिव धनुष को उठा भी नहीं पाया था । अतः इन दोनों अपमानों का बदला लेने के लिए उसने सीता मां का हरण कर लिया । यदि रावण के पास विस्मृति का वरदान होता, तो न तो माता सीता का हरण होता, और न ही राम – रावण युद्ध ।
उपर्युक्त दोनों घटनाओं से यह समझा जा सकता है कि भूलना भी कभी कभी अत्यंत आवश्यक है । यदि अपना अपमान भुला पाने का वरदान सभी के पास होता, तो श्राप, बद्दुआ, आह जैसे शब्दों का तो जन्म ही नहीं होता ।
विस्मृति के फलस्वरूप हो सकता है कि शायद विश्व शांति स्थापित हो जाए । या घर परिवार में होने वाले कितने ही छोटे मोटे विवाद सुलझ जाएं । तो कहानी का सार यह है महोदय, कि भूलना एक अच्छी आदत है ।

डिप्रेशन यानी कि अवसाद आज के समय में एक चिंताजनक स्थिति बनता जा रहा है । इसका मूल कारण है तनाव, जिसका अधिकांश हिस्सा बुरी यादों से बनता है । कोई बीती बात, ताना, असफलता, किसी अपने का छोड़ कर जाना, किसी का धोखा देना इत्यादि बहुत सी ऐसी बातें हैं जिन्हें हम भूलना तो चाहते हैं, पर भूल नहीं पाते । फिर जब भी अकेले होते हैं, तो यही बातें और यादें हमारा तनाव बढ़ाती हैं, जिससे न केवल मस्तिष्क पर बल्कि शारीरिक स्वास्थ्य पर भी बुरा असर पड़ता है ।
विज्ञान कहता है कि यदि हमारे मस्तिष्क में कोई परेशान करने वाली बात काफी समय तक रहे, तो तनाव संबंधी अनेक बीमारियों को दावत दे सकती है । शायद यही कारण है कि जब हम दुःखी या तनावग्रस्त होते हैं, तब नींद ज़्यादा आती है, क्यूंकि मस्तिष्क उस तनाव को भूलना चाहता है । और ईश्वर ने शायद हमें नींद का वरदान भी इसीलिए दिया है कि हम कुछ छोटी मोटी बुरी यादों को भूल जाएं । ताकि अगली सुबह जब हम उठें, तो हमारे पास एक नई उम्मीद, एक नई ऊर्जा हो ।

सोचिए कितना अच्छा हो कि किसी सुबह आप उठें, और ये भूल जाएं कि रात को किस बात पे रोते हुए सोए थे । जिस इंसान से कोई मनमुटाव हो गया था, वो आज शाम आपसे मिले और आप यही याद न कर पाएं कि मनमुटाव आखिर हुआ क्यों था, और जब कुछ याद ही न आए तो सबकुछ भूलकर आप उसे फिर से गले लगा लें । कई बार ऐसा होता है कि हमसे हुई किसी गलती की माफ़ी हम चाह कर भी नहीं मांग पाते, जबकि सामने वाला इंसान हमारे लिए बहुत ज़रूरी होता है । तब हम सोचते हैं कि काश ! ये सबकुछ भुला के एक बार फिर पहले जैसा हो जाए !
वैसे देखा जाए, तो भूलने की बीमारी का एक और फायदा है, कि हम अपना फेवरेट टीवी शो बार बार देख सकते हैं, वो भी बिना उकताये । ज़िंदगी से शिकायतें, लोगों के ताने, रिश्तेदारों या दोस्तों से शिकवे, और न जाने कितनी ही बातें ऐसी होती हैं जिन्हें भूलना हमारे बस में नहीं होता, और यही बातें जब तब हमारे ज़हन में उठ उठ कर हमारा खून जलाती हैं। तो सोचिए, अगर ये भूलने की बीमारी सबको लग जाए, तो कितना अच्छा हो ।
तो अगर अगली बार आप कुछ भूल जाएं, तो मुस्कुराइएगा, कि आपको एक वरदान मिला है !
और हाँ! एक और बात…आप अपनी राय कमेंट में बताना तो नहीं भूल रहे हैं ना?
लेखिका: धैर्या छाजेड
शिक्षिका (एलेन करियर इंस्टीट्यूट, रायपुर)
Author: Dhairya Chhajed
Faculty (ALLEN CAREER INSTITUTE, RAIPUR)
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