नई दिल्ली: आज भारत के महान वैज्ञानिक और परमाणु ऊर्जा के जनक डॉ. होमी जहांगीर भाभा की 116वीं जयंती है। उन्होंने भारत को वैज्ञानिक रूप से सशक्त बनाने और परमाणु ऊर्जा के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनाने का सपना देखा था। उनकी दूरदर्शिता और वैज्ञानिक सोच ने देश का भविष्य बदल दिया। उन्होंने भारत को परमाणु शक्ति के रूप में स्थापित किया और वैज्ञानिक अनुसंधान की मजबूत नींव रखी।
डॉ. भाभा का जन्म 30 अक्टूबर 1909 को मुंबई के एक पारसी परिवार में हुआ था। उनके पिता जहांगीर होरमुसजी भाभा एक प्रसिद्ध वकील थे। बचपन से ही उन्हें विज्ञान और गणित में गहरी रुचि थी। उन्होंने मुंबई के कैथेड्रल स्कूल और एल्फिस्टन कॉलेज से पढ़ाई की, फिर 1927 में इंजीनियरिंग की पढ़ाई के लिए कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय गए।

कैम्ब्रिज में रहते हुए भाभा का झुकाव भौतिकी की ओर बढ़ा। उन्होंने सैद्धांतिक भौतिकी में गहन अध्ययन किया और 1935 में न्यूक्लियर फिजिक्स में पीएचडी प्राप्त की। उन्होंने “भाभा स्कैटरिंग” और “भाभा-हाइटलर थ्योरी” जैसे महत्वपूर्ण सिद्धांत दिए, जिससे उन्हें अंतरराष्ट्रीय पहचान मिली।
1939 में द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान वे भारत लौट आए और बेंगलुरु में भारतीय विज्ञान संस्थान (IISc) में सर सी.वी. रमन के साथ कार्य किया। उन्होंने वहीं कॉस्मिक किरण अनुसंधान केंद्र की स्थापना की। 1941 में मात्र 31 वर्ष की उम्र में वे रॉयल सोसाइटी के फेलो बने।
भारत के वैज्ञानिक विकास को आगे बढ़ाने के लिए उन्होंने 1945 में टाटा ट्रस्ट की मदद से टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ फंडामेंटल रिसर्च (TIFR) की स्थापना की। आजादी के बाद, उनके प्रयासों से 1948 में भारतीय परमाणु ऊर्जा आयोग (IAEC) का गठन हुआ और वे इसके पहले अध्यक्ष बने।
1954 में उन्होंने ट्रॉम्बे में एक नया परमाणु अनुसंधान केंद्र शुरू किया, जिसे बाद में उनके सम्मान में भाभा एटॉमिक रिसर्च सेंटर (BARC) नाम दिया गया। उनके नेतृत्व में, 1956 में भारत का पहला परमाणु रिएक्टर ‘अप्सरा’ शुरू हुआ, जिससे भारत एशिया का पहला देश बना जिसने यह उपलब्धि हासिल की। उसी वर्ष उन्हें पद्म भूषण सम्मान मिला।
24 जनवरी 1966 को जिनेवा जाते समय उनकी फ्लाइट आल्प्स पर्वत श्रृंखला के पास मॉन्ट ब्लैंक में दुर्घटनाग्रस्त हो गई, जिसमें उनकी मृत्यु हो गई। वे मात्र 56 वर्ष के थे।
डॉ. भाभा केवल वैज्ञानिक ही नहीं, बल्कि एक कुशल प्रशासक, कला प्रेमी और दूरदर्शी योजनाकार भी थे। उन्होंने भारत के तीन-चरणीय परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम की रूपरेखा तैयार की, जो आज भी देश की परमाणु नीति की नींव है।
























