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प्रेम और विरह

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जज़्बात-ए-ग़ज़ल:धीरे-धीरे आदत सी हो जाती है…गज़लकार: आशीष सिंह ठाकुर ‘अकेला’

धीरे - धीरे आदत सी हो जाती है... धीरे - धीरे आदत सी हो जाती है, तब पीड़ा भी राहत सी हो जाती है, ना मिल पाये,ना...

आज की कविता: माँ की आस

आज की कविता: माँ की आस बेटे ने पूछा मां से- 'माँ' मेरी मुझको बतला दो, क्यों गांव यह सूना सूना है? ना ही मेरे संगी...

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