जज़्बात-ए-ग़ज़ल:धीरे-धीरे आदत सी हो जाती है…गज़लकार: आशीष सिंह ठाकुर ‘अकेला’

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धीरे – धीरे आदत सी हो जाती है…


धीरे – धीरे आदत सी हो जाती है,
तब पीड़ा भी राहत सी हो जाती है,

ना मिल पाये,ना हासिल हो तो फिर ये,
चाहत भी इक आफ़त सी हो जाती है,

ग़म खाते हैं हम, आँसू पीते हैं, हम,
परिशानी तक दावत सी हो जाती है,

दिन है मुश्किल, रातें करवट लेते हैं,
तन्हाई से चाहत सी हो जाती है,

जब मिलते हैं बेहद ग़म ओ रुसवाई तब,
से उलफ़त में बरकत सी हो जाती है।


गज़लकार: आशीष सिंह ठाकुर ‘अकेला’

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