🦜 विश्व तोता दिवस- भारतीय नजरिए से रंग-बिरंगे पक्षियों की पुकार: रंगों, रिवाज़ों और रक्षक बनने की कहानी
प्रकृति में कुछ पक्षी ऐसे होते हैं जो अपने रंग, आवाज़ और व्यवहार से लोगों का दिल जीत लेते हैं – तोता (Parrot) उन्हीं में से एक है। हर साल 31 मई को विश्व तोता दिवस मनाया जाता है ताकि इन बुद्धिमान और सामाजिक पक्षियों के संरक्षण के प्रति लोगों को जागरूक किया जा सके। यह दिन केवल एक औपचारिकता नहीं है, बल्कि यह हमें यह सोचने पर मजबूर करता है कि क्या हम अपने बच्चों को भविष्य में पेड़ों पर चहचहाते, बात करते या उड़ते हुए तोते दिखा पाएँगे?


इस लेख में हम जानेंगे कि तोते क्यों खास हैं, भारत में उनका क्या महत्व है, और क्यों आज उनका संरक्षण एक ज़रूरत बन चुका है।

तो आज ही करें अपना भविष्य सुरक्षित!
तोता: केवल एक पक्षी नहीं, प्रकृति की मुस्कान
जब भी आप किसी हरियाली वाले इलाके में जाते हैं और अचानक कोई हरा-लाल चमकीला पक्षी “टियूं-टियूं” करता हुआ उड़ जाए, तो समझ जाइए कि कोई तोता आपका स्वागत कर रहा है। तोते अपनी रंगीन पंखों, घुंघराली पूंछ और चोंच से सभी का ध्यान आकर्षित करते हैं।
दुनिया भर में करीब 400 के आसपास तोते की प्रजातियाँ पाई जाती हैं। भारत में तोते की कई किस्में देखी जाती हैं, जिनमें सबसे आम है रोज़-रिंगेड पैरीकीट यानी हरा तोता जिसकी गर्दन पर हल्का गुलाबी छल्ला होता है।
तोते की समझदारी: जो बात कर सकता है, वह सोच भी सकता है
तोते को यूं ही नहीं ‘बोलने वाला पक्षी’ कहा जाता है। वह जो सुनता है, उसे दोहराने की कला में माहिर होता है। कुछ तोते तो अपने मालिकों की आवाज़ तक हूबहू निकाल लेते हैं। ये कोई मजाक नहीं है — तोते की बुद्धिमत्ता वैज्ञानिक रूप से सिद्ध है।
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वे इंसानों के जैसे शब्दों की पहचान कर सकते हैं
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कुछ तोते रंगों और आकृतियों को पहचानना सीख सकते हैं
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वे साथी पक्षियों या इंसानों के साथ भावनात्मक संबंध भी बना सकते हैं
प्रकृति में तोते का योगदान: सिर्फ शोभा नहीं, सेवा भी
तोते केवल सुंदरता के लिए नहीं हैं, वे पर्यावरण में अहम भूमिका निभाते हैं। वे पेड़ों से फल खाकर बीज दूर-दूर तक गिरा देते हैं जिससे नए पौधे उगते हैं। इस तरह वे वनस्पति का प्राकृतिक विस्तार करते हैं।
इसके अलावा वे कीड़ों और कीटों को भी खाते हैं, जिससे खेती में लाभ होता है। गाँवों में किसान आज भी तोते को खेत का मित्र मानते हैं।
भारत में तोते का सांस्कृतिक महत्व
धार्मिक कथाओं में तोता
भारत जैसे देश में जहाँ हर जीव-जंतु को किसी न किसी देवी-देवता से जोड़ा गया है, वहाँ तोते को प्रेम और वाणी का प्रतीक माना गया है।
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कामदेव, जो प्रेम के देवता हैं, उनके वाहन के रूप में तोते को दिखाया जाता है।
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मदुरै की मीनाक्षी देवी को हमेशा एक तोते के साथ दिखाया जाता है, जो उनकी बुद्धि और सौंदर्य का प्रतीक है।
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आंडाल, तमिल संत कवियित्री, की छवियों में भी तोता एक अहम पात्र होता है।
साहित्य और लोककथाओं में तोता
भारतीय साहित्य में तोता एक बुद्धिमान कथावाचक की भूमिका में रहा है। ‘शुक-सप्तति’ नामक संस्कृत ग्रंथ में एक तोता हर रात अपनी मालकिन को नैतिक कहानियाँ सुनाता है।
पंचतंत्र और जातक कथाएँ भी तोते की चतुराई की मिसालें पेश करती हैं। वहाँ वह केवल एक बोलने वाला पक्षी नहीं, बल्कि सोचने और निर्णय लेने वाला पात्र होता है।
कला और शिल्प में तोते की छवि
भारत की पारंपरिक कलाओं में तोते की उपस्थिति सहज दिखती है:
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मधुबनी चित्रों में तोते फूलों, देवी-देवताओं और प्रेमियों के बीच दिखाई देते हैं।
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राजस्थानी और मुगल चित्रकला में प्रेम दृश्य हो या शाही बाग़, तोता उसमें सौंदर्य बढ़ाने का काम करता है।
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पटचित्रा (ओडिशा) और वारली (महाराष्ट्र) जैसी कलाओं में तोते के दृश्य जीवन और प्रकृति से जुड़ाव को दर्शाते हैं।
लोक परंपरा: तोता ज्योतिष
तमिलनाडु और आंध्र प्रदेश में एक अनोखी परंपरा है – तोता ज्योतिष। इसमें प्रशिक्षित तोते ताश जैसे कार्डों में से एक कार्ड खींचते हैं, और ज्योतिषी उस कार्ड के अनुसार भविष्यवाणी करता है। यह न केवल मनोरंजक होता है, बल्कि लोक आस्था और जीव-जगत के रिश्तों की एक मिसाल भी है।
संकट में तोते: खतरे की घंटी
आज भले ही हम तोते को पिंजरे में या कभी-कभी आसमान में देख लें, लेकिन हकीकत यह है कि तोते की कई प्रजातियाँ लुप्त होने की कगार पर हैं।
मुख्य खतरे:
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अवैध पालतू व्यापार: बच्चों की खुशी के नाम पर तोते को जंगल से पकड़कर बेचा जाता है।
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वनों की कटाई: पेड़ कटने से उनके घोंसले खत्म हो जाते हैं।
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प्रदूषण और जलवायु परिवर्तन: उनके प्राकृतिक रहन-सहन पर असर डालता है।
भारत में संरक्षण प्रयास
भारत सरकार ने तोते को वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 के तहत संरक्षित प्राणी घोषित किया है। किसी भी तोते को पिंजरे में पालना या व्यापार करना गैरकानूनी है।
इसके अलावा कई पर्यावरण संगठन तोते की सुरक्षा और पुनर्वास के लिए काम कर रहे हैं। स्कूलों और गाँवों में जागरूकता कार्यक्रम चलाए जा रहे हैं ताकि लोग जंगलों और उनके निवासियों को समझें।
एक बालक की कल्पना: “अगर तोते उड़ जाते…”
कल्पना कीजिए एक बच्चा अपने दादा-दादी के साथ बाग में जाता है और कहता है — “दादी, वो हरा पंछी कहाँ गया जो हर बार मुझसे बात करता था?”
क्या हम ऐसा भविष्य चाहते हैं जहाँ बच्चों को तोते की आवाज़ सिर्फ यूट्यूब पर सुनाई दे? हमें आज ही सोचना होगा।
हम क्या कर सकते हैं?
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तोते को कभी पिंजरे में न रखें — यह अपराध है और अनैतिक भी।
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फलों और पेड़ों को बचाएँ — तोते वहीं रहते हैं जहाँ भोजन और सुरक्षा हो।
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अपने बच्चों को बताएं कि तोता केवल खिलौना नहीं, एक जीवित आत्मा है।
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स्थानीय पर्यावरण कार्यक्रमों में भाग लें, वृक्षारोपण करें और जागरूकता फैलाएँ।
एक पक्षी, एक पहचान, एक जिम्मेदारी
तोता केवल हरे रंग का एक पक्षी नहीं है। वह हमारी संस्कृति का हिस्सा है, हमारी कहानियों का पात्र है और हमारी धरती का जीवंत संकेत है। विश्व तोता दिवस हमें यह याद दिलाता है कि इन बोलते हुए पक्षियों की चुप्पी न हो जाए।
आइए, मिलकर यह संकल्प लें कि हम अपने बच्चों को किताबों में नहीं, बल्कि आकाश में उड़ते तोते दिखाएँगे।
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