ऐतिहासिक विदाई: निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति पाने वाले भारत के पहले व्यक्ति हरीश राणा का निधन
नई दिल्ली — भारत के कानूनी और चिकित्सा इतिहास में एक युगांतरकारी अध्याय का अंत हो गया है। सुप्रीम कोर्ट से निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति पाने वाले देश के पहले व्यक्ति, हरीश राणा का दिल्ली एम्स (AIIMS) में निधन हो गया है।
31 वर्षीय हरीश पिछले 13 वर्षों से ‘परसिस्टेंट वेजिटेटिव स्टेट’ (कोमा जैसी स्थिति) में थे। 2026 में सुप्रीम कोर्ट द्वारा ‘गरिमा के साथ मृत्यु’ के अधिकार को मान्यता देने के बाद, यह इस कानून का पहला व्यावहारिक क्रियान्वयन था।
हादसे से कानूनी मिसाल तक का सफर
हरीश की संघर्षपूर्ण कहानी 2013 में शुरू हुई थी। पंजाब यूनिवर्सिटी से बी.टेक की पढ़ाई के दौरान, चौथी मंजिल की बालकनी से गिरने के कारण उनके सिर में गंभीर चोटें आई थीं। तब से वे कृत्रिम पोषण और ऑक्सीजन के सहारे जीवित थे।
11 मार्च, 2026 को भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने एक ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए हरीश को ‘सम्मान के साथ मरने’ की अनुमति दी। न्यायालय ने एम्स दिल्ली को निर्देश दिया कि एक विशेष चिकित्सा योजना के तहत उनके जीवन रक्षक उपकरणों को हटाया जाए।
चिकित्सा प्रक्रिया और एम्स की भूमिका
गाजियाबाद स्थित उनके आवास से उन्हें एम्स के डॉ. बी.आर. अंबेडकर संस्थान की ‘पेलिएटिव केयर यूनिट’ में स्थानांतरित किया गया। इस पूरी प्रक्रिया की निगरानी के लिए एक विशेषज्ञ मेडिकल बोर्ड का गठन किया गया:
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नेतृत्व: प्रोफेसर सीमा मिश्रा (विभागाध्यक्ष, एनेस्थीसिया और पेलिएटिव मेडिसिन)।
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विशेषज्ञ दल: इसमें न्यूरोसर्जरी, ऑन्को-एनेस्थीसिया और मनोचिकित्सा के डॉक्टर शामिल थे।
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प्रक्रिया: चिकित्सा सलाह के अनुसार, उनके पोषण संबंधी समर्थन (Feeding Support) को धीरे-धीरे बंद कर दिया गया, जिससे उनकी मृत्यु प्राकृतिक रूप से सुनिश्चित हो सके।
एक भावुक विदाई
सोशल मीडिया पर प्रसारित एक मार्मिक वीडियो में हरीश के परिवार को उन्हें अंतिम विदाई देते देखा गया। वीडियो में उनकी मां उनके पास बैठी हैं और ब्रह्मा कुमारी की एक सदस्य उनके माथे पर तिलक लगाकर उन्हें शांति से जाने की प्रार्थना कर रही हैं:
“सभी को माफ कर दो, सभी से माफी मांग लो। अब जाने का समय हो गया है, ठीक है?”
क्या है निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia)?

सक्रिय इच्छामृत्यु (जहाँ जानलेवा इंजेक्शन दिया जाता है) के विपरीत, निष्क्रिय इच्छामृत्यु में मरीज को जीवित रखने वाले उपचार या उपकरणों (जैसे वेंटिलेटर या फीडिंग ट्यूब) को हटा लिया जाता है। यह प्रक्रिया केवल उन मामलों में अपनाई जाती है जहाँ मरीज के ठीक होने की कोई गुंजाइश नहीं होती।
यह मामला भारत में भविष्य के लिए एक मिसाल बन गया है, जो उन परिवारों को कानूनी सहारा देता है जो लंबे समय से ऐसी लाइलाज पीड़ा झेल रहे हैं।
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