छत्तीसगढ़ की राजनीति में किसानों को बड़ा महत्व है। चुनावी हारजीत में उनकी निर्णायक भूमिका होती है। जो राजनीतिक दल उनको सबसे ज्यादा प्रभावित करता है,यह साबित करने में सफल रहता है कि वही उसका सबसे बड़ा हितैषी है तो चुनाव में उस राजनीतिक दल के जीतने की संभावना ज्यादा होती है।यही वजह है कि जब भी धान खरीदी होती है तो सरकार उसे पूरी गंभीरता से लेती है और किसानों को यह बताने का प्रयास करती है कि पिछली सरकार से हमारी धान खरीदी की व्यवस्था ज्यादा अच्छी है, धान खरीदी में हमने किसानों का ज्यादा अच्छे से ख्याल रखा है। वही जो राजनीतिक दल सत्ता में नहीं रहता है वह सरकार की धान खरीदी की तारीख से लेकर हर तरह की व्यवस्था को अपर्याप्त बताता है।
साय सरकार ने पिछली बार की तरह इस बार भी धान खरीदी १५ नवंबर से करने की घोषणा की है। सरकार की इस बार की धान खरीदी नीति के अनुसार धानखरीदी १५ नवंबर से ३१ जनवरी तक होगी।इस दौरान २५ लाख किसानों से ३१०० रुपए प्रति क्विंटल के हिसाब से प्रति एकड़ २१ क्विंटल धान खरीदा जाएगा।समर्थन मूल्य पर धान खरीदी के बाद पैसे का भुगतान सात दिन में किया जाएगा तथा अंतर की राशि अलग से दी जाएगी। इस बार धान खरीदी में पारदर्शिता के लिए एग्रीस्टेक पोर्टल में किसान पंजीयन अनिवार्य किया गया है। इससे किसान की सही पहचान हो सकेगी तथा डुप्लीकेशन व दोहराव की समस्या नहीं होगी।

इस बार डिजिटल क्राप सर्वे कराया गया है ताकि धान बेचने व खरीदने में कोई गड़बड़ी न हो। पिछली बार की तरह इस बार भी किसानों को धान बेचने में किसी तरह की परेशानी न हो इसके लिए टोकन की व्यवस्था की गई है। यह व्यवस्था आनलाइन होने के कारण किसानों को टोकन लेने में कोई दिक्कत नहीं होगी। किसान अपनी सुविधा के अनुसार टोकन ले सकते हैं और धान बेच सकते हैं। इस बार धान खरीदी के लिए २७३० धान खरीदी केंद्र बनाए गए हैं। पिछली बार की तरह इस बार भी १६० लाख धान खरीदी की लक्ष्य है।इस बार राज्य सरकार को सेंट्रल पूल में ७३ लाख टन चावल देना है। इस बार यह निर्णय किया गया है कि समिति द्वारा खराब धान यानी शून्य सुखत की स्थिति में लाई जाती है तो उसे ५ रुपए प्रति क्विंटल की दर से प्रोत्साहन राशि दी जाएगी।
धान खरीदी के लिए बारदाने की व्यवस्था जरूरत के हिसाब से की जाएगी।अऩ्य राज्यों से आने वाले धान को रोकने के लिए सीमावर्ती क्षेत्रों में कड़ी निगरानी की जाएगी। सरकार की कोशिश होती है कि किसानों से पिछली बार से ज्यादा धान खरीदा जाए,इसलिए धान खरीदी का लक्ष्य ज्यादा रखा जाताहै। इस बार धान उत्पादन ज्यादा होने की संभावना है इसलिए उम्मीद है कि पिछली बार ज्यादा धान खरीदा जाएगा। पिछली बार २४.८१ लाख किसानों से १४९ लाख टन धान की खरीदी की गई थी, इस बार हो सकता है कि इस बार इससे ज्यादा खरीदी की जाए। पिछली बार किसानों को तीस हजार करोड़ का भुगतान किया गया था इस बार इससे ज्यादा का भुगतान हो।
राज्य में सरकार किसी की भी हो धान खरीदी की तारीख को लेकर विवाद तो होता है, सरकार ने १५ नवंबर धान खरीदने का फैसला किया है तो कांग्रेस मांग कर रही है कि सरकार को एक नवंबर से धान खरीदी शुरू करना चाहिए। कांग्रेस का कहना है कि एक नवंबर तक किसानों का धान खेत से खलिहान तक बेचने के लिए तैयार हो जाता है, यदि १५ नवंबर से धान खरीदी शुरू की जाती है तो किसानों के इसके लिए १५ दिन इंतजार करना होगा। कांग्रेस का यह भी कहना है कि किसानों को पंजीयन में परेशानी हो रही है इस वजह अब तक २१ लाख िकसानों का ही पंजीयन हो सका है। पिछले साल २८ लाख किसानों ने धान बेचा था इस हिसाब से अब तक ७ लाख किसानों का पंजीयन होना है।कांग्रेस का कहना है सरकार ने २५ लाख किसानों का धान खरीदने की बात कही है इसका मतलब है कि वह इस बार सभी किसानों का धान नहीं खरीदने वाली है। कांग्रेस का कहना है कि सरकार ने बारदाने की व्यवस्था भी अभी नहीं की है जब कि सरकार को मालूम है कि हर साल धान खरीदी बारदाने की कमी से प्रभावित होती है।
कांग्रेस के बाद भारतीय किसान संघ ने धान खरीदी को लेकर अपनी अलग मांगें की है तथा अपनी मांगों को लेकर १३ अक्टूबर को सीएम हाउस का घेराव करने की घोषणा की है। भारतीय किसान संघ का कहना है कि सरकार दो वर्ष के समर्थन मूल्य की वृध्दि १८६ रुपए जोड़कर इस बार धान खरीदी ३२८६ रुपए में करे।जहां तक समर्थन मूल्य में वृध्दि की बात है तो केंद्र सरकार हर साल इसमें वृध्दि करती है लेकिन राज्य सरकार चाहे वह भूपेश बघेल की रही हो या साय सरकार हो वह इसे जोड़कर नहीं देती है। भूपेश सरकार ने २५०० रुपए में धान खरीदने की घोषणा थी उसने हर साल इतने में ही धान खरीदा और उनको समर्थन मूल्य जोड़कर देने की जरूरत इसलिए नहीं है कि क्योंकि वह देश में किसानों को धान का मूल्य सबसे ज्यादा दे रहे हैं। जो बात भूपेश सरकार कहती है, वह बात साय सरकार भी कह सकती है कि हम तो किसानों को पहले से पूरे देश में सबसे ज्यादा पैसा दे रहे हैं। इसलिए हमको समर्थन मूल्य जोड़कर देने की जरूरत नहीं है। यह यहां के सरकारों की परंपरा है, साय सरकार भी इस परंपरा को निभा रही है तो इसमें गलत कुछ नहीं है।
























