वनों का वरदान: पारंपरिक ज्ञान से आधुनिक उपयोग तक पर्यावरणीय गुण एवं चमत्कार

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वनों का वरदान: पारंपरिक ज्ञान से आधुनिक उपयोग तक पर्यावरणीय गुण एवं चमत्कार

 
डॉ प्रकाश चन्द्र ताम्रकार

विभागाध्यक्ष (इंटीरियर डेकोरेशन एंड डिजाइन)

शासकीय कन्या पालीटेक्निक रायपुर (छ.ग.)


वन, पेड़-पौधे, फसल आदिकाल से समस्त प्राणियों का भरण-पोषण करते आ रहे हैं। पेड़ पौधों, वनस्पतियों जड़ी-बूटियों आदि के महत्व, गुण, उपयोगिता, और आवश्यकता से सभी चिरकाल से परिचित हैं  और इनके उपभोगी रहे हैं। भारत ने 2070 तक कार्बन न्यूट्रल बनने का लक्ष्य सर्वोपरि रखा है । भारत का वन क्षेत्र वैश्विक औसत 31 प्रतिशत से कम 25 प्रतिशत है । भविष्य में वन क्षेत्र को बढ़ा कर 33 प्रतिशत करने का लक्ष्य निर्धारित है । प्रदूषण के वर्तमान परिदृश्य में उसके पर्यावरणीय औषधीय गुण पारंपरिक व नवीनतम उपयोग का सिंहावलोकन अब काफ़ी प्रासंगिक हो चुका है ।

वृक्षों के पर्यावरणीय गुण


वृक्ष एक वर्ष मे 700 किलो ऑक्सीजन तक देता है और 20 टन कार्बन डाइऑक्साइड अवशोषित करता है । गर्मियों में लगभग 4° सेंटीग्रेड तक तापमान कम करने में समर्थ है।  पारा, लिथियम, लेड, जैसे जहरीले धातुओं के 80 किलो ग्राम मिश्रण को सोख लेने की क्षमता से परिपूर्ण है । और तो और यह एक लाख वर्ग किलोमीटर दूषित वायु को फिल्टर करता है ।

पीपल के पत्तों का फैलाव बड़ा होता है जबकि उसकी डंठल पतली होती है, जिससे वे बिना हवा के भी हलचल करते रहते हैं और लगातार शुद्ध ऑक्सीजन प्रदान करते हैं। यह वृक्ष कार्बन डाइऑक्साइड को पूरी तरह अवशोषित करने में सक्षम होता है। इसमें एस्कार्बिक एसिड की मात्रा सबसे अधिक पाई जाती है, जिससे यह प्रदूषण कम करने में अत्यधिक प्रभावी होता है।

अनाजों में एस्कार्बिक एसिड की मात्रा सबसे अधिक मक्का में मिलती है, इसके बाद कुसुमी, अलसी, अरहर और मटर का स्थान आता है। बरगद लगभग 80% और नीम 75% तक कार्बन डाइऑक्साइड को अवशोषित करने में सक्षम होते हैं। आम का पेड़ अपने बड़े सतही क्षेत्र के कारण अन्य पेड़ों की तुलना में अधिक कार्बन डाइऑक्साइड सोखता है।

कदंब न केवल वायुमंडलीय संतुलन बनाए रखने में सहायक है, बल्कि जल संचयन में भी उपयोगी है। वहीं बांस, बेंजीन जैसे जहरीले तत्वों को भी शुद्ध कर सकता है। इसे गमले में लगाकर घर के अंदर भी रखा जा सकता है, जिससे यह वायु को स्वच्छ बनाए रखने में योगदान देता है।

पारंपरिक औषधीय  उपयोग

विभिन्न स्त्रोतों की मानें तो पीपल के पत्ते प्रोटीन, कैल्शियम, आयरन, मैंगनीज़, कापर, फाइबर, एंटी डायबिटीज़ होते हैं ।पीपल के छाल से पेट साफ होता है । कदंब के फल फूल और छाल कई औषधीय गुणों से भरपूर माने जाते हैं, जिनका उपयोग पुरातन काल से किया जाता रहा है । इसके औषधीय गुणों का उल्लेख सुश्रुत संहिता में भी मिलता है । आयुर्वेद के अनुसार कदंब का फूल शरीर के तीनों दोषों  (शरीर के तीन मुख्य दोष वात, पित्त और कफ़) को नियंत्रित करने में सक्षम होता है ।

इसके पत्तों का उपयोग यकृत संबंधी रोगों के इलाज में प्रभावी माना जाता है। इसके अर्क में प्रचुर मात्रा में जीवाणुरोधी गुण पाए जाते हैं, जिससे यह त्वचा के लिए लाभकारी होता है। बांस का पौधा सिलिका से समृद्ध होता है और इसमें विटामिन A, विटामिन B6 और विटामिन E भरपूर मात्रा में मौजूद होते हैं। ये तत्व शरीर की प्राकृतिक रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाने और विषैले तत्वों को बाहर निकालने में मदद करते हैं।

आम की पत्तियों में हाइपोटेंसिव गुण पाए जाते हैं, जो उच्च रक्तचाप को कम करने में सहायक होते हैं। हालांकि विभिन्न शोधों में कुछ भिन्न मत हो सकते हैं, लेकिन यह सर्वसम्मति है कि पेड़-पौधों और फसलों में अनेक अमूल्य औषधीय गुण मौजूद हैं।

व्यवसायिक उपयोग

वैश्विक स्तर पर वृक्षों को लेकर व्यापक अनुसंधान किए जा रहे हैं। इन अध्ययनों के परिणामस्वरूप बायो फ्यूल, बायो प्लास्टिक, हरित निर्माण सामग्री और लकड़ी आधारित कांक्रीट जैसे नवीन उत्पाद विकसित किए जा रहे हैं। आज लकड़ी का उपयोग बहुमंजिला भवनों, स्टेडियमों और शोध संस्थानों के निर्माण में भी किया जा रहा है।

तकनीकी नवाचारों की बदौलत लकड़ी को अब जलरोधी और अग्निरोधी बना दिया गया है, जिससे यह सीमेंट कांक्रीट जैसी मजबूती और सुरक्षा प्रदान कर सकती है।

नवीनतम उपयोग

दुनियाभर में पेड़ों पर गहराई से शोध किए जा रहे हैं, जिनके माध्यम से बायो फ्यूल, बायो प्लास्टिक, ग्रीन बिल्डिंग मटेरियल्स और वुडन कंक्रीट जैसे नवाचारी उत्पाद तैयार किए जा रहे हैं। लकड़ी का उपयोग अब बहुमंजिला इमारतों, स्टेडियमों और अनुसंधान संस्थानों के निर्माण में भी सफलतापूर्वक किया जा रहा है।

आधुनिक तकनीकों के जरिये लकड़ी को जल और आग से सुरक्षित बनाया गया है, जिससे यह सीमेंट कांक्रीट के विकल्प के रूप में उभर रही है।

निष्कर्ष

पीपल, कदंब, शीशम, कीकर, नीम, गुलमोहर, आम और बांस जैसे पौधों का रोपण वायु प्रदूषण को कम करने में सहायक हो सकता है, जो वर्तमान समय की बड़ी चुनौतियों में से एक है। मक्का, कुसुम और अरहर जैसी फसलें भी पर्यावरण प्रदूषण को नियंत्रित करने में योगदान देती हैं। ये वृक्ष केवल औषधीय गुणों से भरपूर हैं, बल्कि इनका गहरा सांस्कृतिक महत्व भी है।

कार्बन न्यूट्रल बनने का लक्ष्य तब ही हासिल किया जा सकता है जब समाज प्रकृति से फिर से गहरा संबंध बनाए। इसके लिए जनसहभागिता अनिवार्य है। केवल वनों और वृक्षों की पूजा पर्याप्त नहीं है, बल्कि इन्हें समझना, सहेजना और अपनी जीवनशैली में सम्मिलित करना आवश्यक है।

वर्तमान वर्षा ऋतु में ऐसे बहुपयोगी और सांस्कृतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण वृक्षों का अधिक से अधिक वृक्षारोपण कर मानव जीवन को अधिक समृद्ध और खुशहाल बनाया जा सकता है।

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