भगवान श्रीकृष्ण का जन्मोत्सव, जन्माष्टमी, केवल धार्मिक पर्व नहीं है, बल्कि यह एक गहरा संदेश है — धर्म की स्थापना, अधर्म का विनाश और सत्यमार्ग पर चलने का संकल्प। द्वापर युग में जब कंस और उसके समान अत्याचारियों ने समाज में भय, अन्याय और भ्रष्टाचार फैलाया, तब श्रीकृष्ण ने अवतार लेकर धर्म की रक्षा की।


आज, कलियुग में भी स्थिति बहुत भिन्न नहीं दिखती। समाज में लोभ, अहंकार, भ्रष्टाचार, हिंसा और स्वार्थ ने मानवीय मूल्यों को कमज़ोर कर दिया है। तकनीक और विज्ञान ने हमें आगे बढ़ाया, लेकिन उसी गति से नैतिक पतन भी गहराता चला गया। परिवार टूट रहे हैं, रिश्तों में विश्वास घट रहा है, राजनीति स्वार्थ का खेल बनती जा रही है और आम आदमी जीवन की आपाधापी में शांति खो बैठा है।
ऐसे समय में श्रीकृष्ण के उपदेश “यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत…” अत्यंत प्रासंगिक हो उठते हैं। गीता का यह संदेश केवल द्वापर युग के लिए नहीं, बल्कि हर युग के लिए है। श्रीकृष्ण ने कर्म, भक्ति और ज्ञान—इन तीन मार्गों से जीवन जीने का आदर्श दिया।
आज की आवश्यकता
कृष्ण की नीति और न्याय – शासन और समाज को कृष्ण की तरह धर्म और नीति से चलाना होगा।
भक्ति में शांति – ईश्वर की भक्ति केवल पूजा-पाठ तक सीमित न होकर मानवता की सेवा में झलके।
संवाद और समाधान – जैसे कृष्ण ने कुरुक्षेत्र में संवाद से धर्मस्थापना का मार्ग दिखाया, वैसे ही आज हमें मतभेद मिटाकर संवाद और सहयोग से समाज का कल्याण करना होगा।
आत्ममंथन – हर व्यक्ति अपने भीतर झांके कि कहीं हम खुद भी छोटे-छोटे “कंस” तो नहीं बन रहे?
जन्माष्टमी हमें यह याद दिलाती है कि अधर्म चाहे कितना भी शक्तिशाली क्यों न हो, धर्म अंततः विजयी होता है। आज के कलियुग में श्रीकृष्ण का संदेश ही वह प्रकाश है, जो अंधकार में पथ दिखा सकता है।
कलियुग की चुनौतियों के बीच श्रीकृष्ण की वाणी हमें चेताती है—“कर्म करो, फल की चिंता मत करो।” यदि हम अपने आचरण और कर्म में धर्म, न्याय और मानवता को स्थान दें, तो न केवल व्यक्तिगत जीवन सुधरेगा, बल्कि समाज भी शांति और समृद्धि की ओर अग्रसर होगा।
