कांग्रेस में यह क्या हो रहा है, क्यों हो रहा है, कांग्रेस का नेतृत्व किसको करना चाहिए। कांग्रेस का नेतृत्व कैसे करना चाहिए,राज्य में चर्चा का विषय बना हुआ है।कांग्रेस में पद के हिसाब से तो कांग्रेस के संगठन का नेतृत्व दीपक बैज को करना चाहिए। विधानसभा के भीतर नेता प्रतिपक्ष डॉ.चरणदास महंत को करना चाहिए।भूपेश बघेल पूर्व सीएम होने के कारण अपने आप को कांग्रेस का सबसे बड़ा नेता समझते हैं और चाहते हैं कि पहले की तरह सब लोग उनको बड़ा नेता माने भी। इसमें कोई शक नहीं है कि वह जब सीएम थे,कांग्रेस के सबसे बड़े नेता थे, होता वही था जो वह चाहते थे। चुनाव जीत गए होते तो आज भी वही होता जो वह चाहते।

उऩके चुनाव हार जाने के कारण स्थिति कुछ तो बदल गई है। भूपेश बघेल भले न स्वीकारें पिछला चुनाव हारने के कारण उनका राजनीतिक कद राज्य में पहले घट गया है लेकिन हकीकत यही है, आलाकमान ने भी उनको पंजाब का प्रभारी बनाकर संकेत दिया था कि वह राज्य की जगह पंजाब पर ज्यादा ध्यान दें।पंजाब में वह पार्टी को उपचुनाव नहीं जिता सके,इससे भी उनकी क्षमता पर सवालिया निशान तो लगा है। आलाकमान तो उसी को ज्यादा महत्व देता है जो सफलता के घोड़े पर सवार रहता है। आलाकमान ने यहां खरगे को भेजा था देखने कांग्रेस का क्या हाल है, खरगे देखकर गए हैं और हिदायत देकर गए हैं कि सभी बड़े नेताओं को मिलजुलकर काम करना है।उनके जाने के बाद बैठक में तो सब बड़े कांग्रेस नेता एकजुट दिखने का प्रयास करते हैं लेकिन फील्ड में सब वही करते हैं जो उनको करना है। यही वजह है कि विधानसभा के भीतर व बाहर लोगों को दिखता है कि कांग्रेस एकजुट नहीं है।
भूपेश बघेल जहां मौका मिलता है वह खुद विरोध प्रदर्शन का नेतृत्व करने पहुंच जाते हैं।तमनार में पेड़ कटाई के मामले में भूपेश बघेल चाहते तो अध्यक्ष दीपक बैज को भी ले जा सकते थे या दीपक बैज गए तो वह भी भूपेश बघेल को ले जा सकते थे, दोनों के अलग अलग जाने से चर्चा तो हुई कि पार्टी एकमत होकर आपसी संवाद कर काम नहीं कर रही है।इसी तरह विधानसभा के भीतर पार्टी विधायकों का नेतृत्व डॉ.चरणदास महंत को करना है लेकिन भूपेश बघेल विधानसभा के भीतर भी चरण दास महंत को बोल कर न सही करके दिखाते हैं कि कांग्रेस नेताओं का नेतृत्व विधानसभा के भीतर कैसे किया जाता है। महंत ने एक दिन पहले विधानसभा मे शालीनता व संवाद की मिसाल पेश की थी।इसके लिए सत्ता पक्ष ने भी उनकी तारीफ की थी, महंत शालीन और संवाद में यकीन रखने वाले नेता हैं, वह इसी तरह नेतृत्व करना चाहते हैं तो उनको करने देना चाहिए।
भूपेश बघेल के इशारे पर दूसरे दिन विधानसभा में जिस तरह हंगामा किया गया, गर्भगृह में जाकर नारेबाजी की, उससे २५ साल से चली आ रही पंरपरा टूट गई। क्योंकि अब तक परंपरा यह थी कि विधायक यदि गर्भगृह में जाते हैं खुद ही निलंबित हो जाते है,बाहर चले जाते हैं, पहली बार ऐसा हुआ कि विधायक गर्भगृह से जाने को कहने पर नहीं गए और उनको विधानसभा अध्यक्ष ने दिनभर के लिए निलंबित कर दिया। माना जा रहा है कि महंत को ऐसा करके संदेश देने की कोशिश की गई है आप जिस तरह नेतृत्व करते हैं, वह ठीक नहीं है।कांग्रेस विधायकों व नेताओं को आक्रामक रहना है।सरकार का हर बात पर विरोध करना है। हर बात पर यही साबित करना है कि सरकार ने गलत किया है।
ऐसा नहीं है तो क्या वजह है कि एक दिन महंत शालीनता व संवाद की मिसाल पेश करते है, और दूसरे दिन शालीनता व संवाद की धज्जियां उड़ा दी जाती है और इस बात की परवाह भी नहीं की जाती है कि इससे विधानसभा की २५साल पुरानी परंपरा टूट गई है। कोई इसके लिए खेद भी व्यक्त नहीं करता है।जब प्रदेश प्रभारी सचिन पायलेट आए थे तो भूपेश बघेल ने उनको बताया था कि कांग्रेस के बड़े नेता सरकार पर तीखा हमला नहीं करते हैं कड़ी आलोचना नहीं करते हैं। मेरी आलोचना करने वालाें पर कार्रवाई नहीं होती है। कांग्रेस के राष्टीय अध्यक्ष खरगे यहां आए थे तो वह कहकर गए थे कि बड़े नेताओं को एकजुट होकर काम करना है। राज्य में विधानसभा व विधानसभा के बाहर लोगों को दिखता नहीं है कि कांग्रेस एकजुट होकर, आपसी संवाद कर काम कर रही है।कोई कुछ कहता है, कोई कुछ कहता है, कोई कुछ करता है, कोई कुछ करता है।























