बिहार विधानसभा चुनाव 2025 के नतीजों में एनडीए ने जहां प्रचंड बहुमत हासिल किया, वहीं महागठबंधन करारी शिकस्त का सामना कर रहा है। एनडीए अपनी जीत का श्रेय विकास, सेवा और सुशासन को दे रहा है, जबकि महागठबंधन नेताओं का आरोप है कि महिलाओं को 10 हजार रुपये देकर वोट खरीदे गए। लेकिन असली सवाल यह है कि हारने के लिए महागठबंधन ने क्या-क्या किया?
फरवरी से नवंबर तक गलतियों की लंबी फेहरिस्त बनी हार की वजह
फरवरी से लेकर नवंबर तक महागठबंधन के भीतर ऐसी कई रणनीतिक गलतियाँ हुईं, जिन्होंने लड़ाई शुरू होने से पहले ही कमज़ोर कर दी। एनडीए से मुकाबला करने की जगह महागठबंधन अपने ही आंतरिक फैसलों, जिद और भ्रम में उलझा रहा।
पहली गलती : फरवरी से ही राहुल गांधी की अलग राह
लोकसभा में विपक्ष के नेता और कांग्रेस के केंद्रीय चेहरे राहुल गांधी फरवरी से ही बिहार में सक्रिय हुए, लेकिन यह सक्रियता महागठबंधन की एकजुट रणनीति बनाने की दिशा में नहीं दिखी। राजद के कोर वोटरों पर प्रभाव डालने जैसे कदम उठाए गए, जैसे प्रदेश प्रभारी बदले, नए प्रदेश अध्यक्ष की नियुक्ति। इनसे महागठबंधन के भीतर ही असहजता पैदा हो गई।
दूसरी गलती : महागठबंधन छोड़ I.N.D.I.A. को आगे बढ़ाने की कोशिश
नीतीश कुमार द्वारा शुरू किया गया I.N.D.I.A. गठबंधन 2024 तक लगभग निष्क्रिय हो चुका था। इसके बावजूद राहुल गांधी बिहार चुनाव को I.N.D.I.A. के फ्रेम में लड़ने की कोशिश करते रहे, जबकि यहां राजद नेतृत्व वाला महागठबंधन पहले से मौजूद था। यह भ्रम जनता और सहयोगी दलों, दोनों में बढ़ा कि असल कमान किसके पास है, तेजस्वी या राहुल?
तीसरी गलती : चुनाव आयोग से लड़ाई में डेढ़ महीना गंवाया
मतदाता सूची सुधार के दौरान कांग्रेस और राजद ने चुनाव आयोग को निशाना बनाना शुरू किया। जीवित मतदाता को ‘भूत’ बताने और गायब बताए गए वोटरों के जीवित मिलने जैसे विवादों ने विश्वसनीयता पर प्रश्नचिह्न लगाया। महत्वपूर्ण मुद्दों को छोड़ विपक्ष डेढ़ महीना चुनाव आयोग VS महागठबंधन की लड़ाई में उलझा रहा, जबकि जनता इस लड़ाई को उचित नजर से नहीं देख रही थी।
चौथी गलती : चुनाव आ गया, सीटें तय नहीं हुईं
यह सबसे बड़ी रणनीतिक चूक थी। कांग्रेस 75+ सीटों की मांग पर अड़ी रही, राजद और कांग्रेस दोनों अपने-अपने प्रत्याशी घोषित करने लगे। कई दल कतार में रहे, लेकिन महागठबंधन में जगह नहीं मिली। नामांकन के बाद तक सीटों का एलान जारी रहा। इस अराजकता ने जमीनी कार्यकर्ताओं का मनोबल तोड़ दिया।
पांचवीं गलती : सीएम चेहरे पर जिद और असहमति
तेजस्वी यादव को राजद ने पहले दिन से मुख्यमंत्री चेहरा बताया, लेकिन कांग्रेस अंत समय में जाकर सहमत हुई। मुकेश सहनी को डिप्टी सीएम बनाने की मांग ने भ्रम और बढ़ाया। कुछ मुस्लिम और अति पिछड़ा वर्ग के मतदाता खुलकर कहने लगे कि हम वोट देंगे और सत्ता किसी और को मिलेगी। यह नाराजगी महागठबंधन के भीतर ही दबा दी गई, लेकिन असर मतदान तक रहा।
लड़ाई एनडीए से कम, खुद से ज्यादा
2025 का बिहार चुनाव महागठबंधन के लिए संदेश है कि रणनीति स्पष्ट न हो तो जनाधार बिखर जाता है, गठबंधन आपसी तालमेल से चलता है, जिद से नहीं। चुनाव आयोग, सीट बंटवारे, चेहरे और गठबंधन के मॉडल पर गलत फैसलों ने लड़ाई कमजोर की। एनडीए मैदान में उतर चुका था, लेकिन महागठबंधन अभी यह तय नहीं कर सका कि लड़ाई लड़नी किस तरह है। परिणाम वही हुआ—लड़ाई शुरू होने से पहले ही हार दिखाई देने लगी।























