रायपुर । केंद्र की नीतियों के साथ समन्वय से छत्तीसगढ़ सहित देशभर में नक्सल विरोधी अभियान तेज किए जा रहे हैं। राज्य गृहमंत्री एवं उप मुख्यमंत्री विजय शर्मा ने स्पष्ट कर दिया है कि माओवादी संगठनों से शांतिवार्ता के द्वार खुले रहेंगे, पर बातचीत के पहले दो अनिवार्य शर्तें पूरी करनी होंगी : हथियार व हिंसा का पूर्ण त्याग और आईईडी व विस्फोटक उपकरणों का निष्कासन।
सरकार का रुख स्पष्ट: हिंसा और वार्ता साथ नहीं चलेंगे

विजय शर्मा ने कहा कि नक्सलियों को सबसे पहले ग्रामीणों पर हमले और हत्याएं रोकनी होंगी। साथ ही जंगलों में सुरक्षाबलों को नुकसान पहुँचाने के लिए लगाए गए आईईडी और विस्फोटक निकाले जाने चाहिए। गृहमंत्री ने दोहराया कि हिंसा और बातचीत एक साथ सम्भव नहीं है — पहले हथियार व हिंसा छोड़ो, तभी वार्ता की बात होगी।
ऑपरेशन का असर : संगठन का ढांचा कमजोर
सरकार की अभियानात्मक कार्रवाई का असर दिखाई दे रहा है। पिछले दो वर्षों में माओवादियों को बड़ा क्षति उठानी पड़ी है; कई शीर्ष नेता मारे गए या गिरफ्तार हुए। सूत्रों के अनुसार केंद्रीय कमिटी के सदस्यों की संख्या 40 से घटकर लगभग 9–10 रह गई है और उनका थिंक-टैंक बुरी तरह प्रभावित हुआ है। बस्तर समेत प्रभावित क्षेत्रों में नक्सली छोटे-छोटे समूहों में बट चुके हैं और नई भर्तियाँ बंद हो गई हैं। पुलिस का दावा है कि ग्रामीण सहयोग भी खत्म हो रहा है, जिससे माओवादी संगठनों का मनोबल टूट रहा है।
आत्मसमर्पण व पुनर्वास: दूसरी पहल
सरकार नक्सलियों के खिलाफ सशस्त्र कार्रवाई के साथ ही आत्मसमर्पण कर रहे लोगों को पुनर्वास की सुविधाएँ भी दे रही है। पिछले दो सालों में छत्तीसगढ़ और तेलंगाना में ‘लोन वर्राटू’ जैसे अभियानों के तहत बड़े पैमाने पर माओवादी नेताओं और कैडरों ने आत्मसमर्पण किया। गिरफ्तारी और सर्च ऑपरेशन भी जारी हैं।
माओवादियों की शर्तें
वहीं माओवादी संगठन सरकार पर आरोप लगाते हुए कह रहा है कि बातचीत के लिए अनुकूल माहौल बनाना राज्य सरकारों की जिम्मेदारी है। उनका कहना है कि बस्तर से सुरक्षाबलों की वापसी हो और कैम्प बंद किए जाएँ — तभी वे वार्ता पर विचार करेंगे।





















