तेजस्वी कम से कम सकारात्मक बातें तो करते हैं

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देश के हर साल किसी न किसी राज्य में चुनाव होते रहते हैं। राजनीतिक दलों के लिए यह मौका जनता का विश्वास जीतने का रहता है।बहुत सारे दल जनता का विश्वास जीतने के लिए कई तरह के प्रयास करते हैं।कोई सभा में बड़े बड़े वादे करता है तो कोई घोषणापत्र जारी कर जनता को विश्वास दिलाता है कि हमने जो वादा किया है,वह पूरा करेंगे।मतदान के दिन तक राजनीतिक दल जनता का भराेसा जीतने का प्रयास करते हैं।सबको लगता है कि जनता उन पर भरोसा करेगी, जनता उनको जिताएगी।कई राजनीतिक दलों का यह भरोसा रिजल्ट आने के दिन तक रहता है। रिजल्ट आने के बाद जो जीत जाता है, वह जनता का शुक्रिया अदा करता है और जो हार जाता है वह हार के लिए कई बहाने बनाता है।

राजनीतिक दलों के लिए विजय हमेशा जनता का निर्णय होता है और हार हो जाती है तो जनता का यही निर्णय साजिश कहा जाता है, भ्रम कहा जाता है,अब तो एक नया शब्द आ गया है कि हमारी हार हुई है तो वोट चोरी हो गया है।परिपक्व राजनेता तो उसे माना जाता है जो जनता के जनादेश को हार हो या जीत एक समान भाव से स्वीकारता है।देश में लोकतंत्र की रक्षा करने की बात तो कई राजनीतिक दल कहते हैं, लोकतंत्र को मजबूत करने की बात कई राजनीतिक दल करते हैं लेकिन जब जनादेश को स्वीकारने की बात आती है तो वह स्वीकारते नहीं है।यह मानते नहीं है कि हमारी कमजोरी के कारण हम हारे हैं। अपनी गलतियों के कारण हारे हैं, जनता ने हमें नहीं चुना तो इसके लिए हमारी कमी खामी सबसे बड़ा कारण है।

हकीकत यह है कि आज देश में चुनाव आयोग ठीक काम कर रहा है, ईवीएम के प्रति जो संदेह था वह दूर हो गया है।कहीं समस्या है तो यह है कि आज सबसे बड़ा व पुराना राजनीतिक दल जीत को तो स्वीकारने काे तैयार है, हार को स्वीकारने को तैयार नहीं है। कांग्रेस जीत को जनादेश मानने को तैयार लेकिन हार को जनादेश मानने को तैयार नहीं है।राहुल गांधी और तेजस्वी यादव ने बिहार का चुनाव एक साथ मिलकर लड़ा है लेकिन दोनों में एक फर्क हर कोई महसूसकर सकता है कि राहुल गांधी की सोच चुनाव को लेकर सकारात्मक नहीं रह गई है। उनका खुद पर अपनी पार्टी पर कोई भरोसा नहीं है।वह चुनाव जीतने के लिए मौके पर मेहनत नहीं करते हैं। चुनाव जीतने की कोई रणनीति नहीं बनाते हैं। चुनाव जीतने वाले प्रत्याशी चुन नहीं पाते हैं और चुनाव का रिजल्ट आने के पहले ही वह मान लेते हैं कि उनकी हार होने वाली है और इसका एक ही कारण है वोट चोरी।

राहुल गांधी इतने ज्यादा चुनाव हार चुके हैं कि उनको लगता है कि जब तक मोदी भाजपा के नेतृत्व कर रहे हैं, कांग्रेस जीत नहीं सकती, वह कांग्रेस को जिता नहीं सकते।उनको अपनी जीत की क्षमता पर ही संदेह है। कोई आदमी जब जीत नहीं पाता है तो स्वाभाविक रूप से हार के लिए बहाने बनाने लगता है। हार हुई नहीं रहती और वह मान के बैठ जाता है कि हम हार रहे हैं जैसे हरियाणा में हारे वैसे बिहार में हारने वाले हैं। जो हरियाणा हुआ वही बिहार में होने वाला है, वोट चोरी।वह खुद के बारे में नहीं बताते हैं कि वह क्यों हार जा रहे हैं, वह मोदी व अमित शाह की जीत के बारे बताते हैं कि वह वोट चोरी करके जीतते हैं।जनता तो जीतने वाले को बड़ा नेता मानते हैं, इस आधार पर तो राहुल गांधी मोदी से बड़े नेता नहीं है लेकिन वह यह कहकर बड़ा नेता बनने का दिखावा करते हैं कि मोदी की सोच व नीयत नफरत फैलाने वाली है और हम सबको जोड़ने वाले हैं।

राहुल गांधी से बेहतर नेता तो तेजस्वी यादव है,वह अपनी पार्टी को जिताने के लिए मेहनत करते हैं। जीतने के लिए जो कुछ किया जाना जरूरी होता है, वह सब करते हैं।वह चुनाव प्रचार के दौरान जीत के प्रति जितने सकारात्मक होते हैं चुनाव प्रचार खत्म हो जाने पर भी जीत के प्रति उतने ही सकारात्मक रहते हैं।१४ नवंबर को चुनाव का रिजल्ट आना हैतो १२ नवंबर को पूरे विश्वास से कहते हैं कि बिहार में तो सरकार महागठबंधन की बनेगी,मैंं १८ नवंबर को सीएम की शपथ लूंगा।वह पूरे भरोसे के साथ कहते हैं कि बिहार में तो वोट लोगों ने बदलाव के लिए दिया है।नई सरकार शपथ लेगी।महागठबंधन को स्पष्ट बहुमत मिलने वाला है।वह सब एग्जिट पोल में एनडीए को बहुमत मिलने की खबर सुनने के बाद कहते हैं तो लोगों को लगता है कि नेता को ऐसा ही हाेना चाहिए, अपनी जीत के प्रति विश्वास से भरा हुआ न कि राहुल गांधी की तरह हार से भरा हुआ, हार से डरा हुआ।

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