रायपुर । टैगोर नगर स्थित पटवा भवन में गुरुवार को चातुर्मासिक प्रचवनमाला में युवा मनीषी मनीष सागर महाराज ने कहा कि जीवन में श्रद्धा का गुण धारण करो। श्रद्धा का अर्थ आस्था, विश्वास व निष्ठा है। श्रद्धा का अर्थ है समर्पण। श्रद्धा का अर्थ है एक ऐसा प्रेम जो विश्वास का रूप लेता है। श्रद्धा के बिना जीवन नहीं चलता। श्रद्धा के बगैर जीवन शुन्य है। श्रद्धा केवन देव,गुरु औऱ धर्म के प्रति ही नहीं अपनो के प्रति भी होनी चाहिए। तभी जीवन में एक दूसरे के प्रति विश्वास बना रहेगा।


उपाध्याय भगवंत ने कहा कि श्रद्धा तभी आएगी जब विश्वास होता है। हमारी ताकत विश्वास है। यह विश्वास हमें ऊर्जा देता है। विश्वास एक उल्लास देता है। श्रद्धा और विश्वास पर ही दुनिया टिकी है। भक्ति बाद में होती है प्रीति पहले होती है। जैसे परमात्मा एवं गुरु हमें अच्छे लगते हैं फिर हम उनकी पूजा करते हैं। धर्म व शस्त्र जीवन के अमृत लगे फिर इनका सेवन होता है। पहले प्रीति होगी फिर भक्ति होगी तो श्रद्धा सही रूप लेगी। हम भी देव,गुरु और धर्म से प्रीति भक्ति करे।
उपाध्याय भगवंत ने कहा कि पहले प्रीति फिर भक्ति तो श्रद्धा सही रूप लेगी। हमें भी देव,गुरु और धर्म से प्रीति और भक्ति करना चाहिए। शर्त ही पहले गुणों से प्रेम हो। गुण लुभाएंगे तो ही प्रीति व समर्पण आएगा। ऐसा होकर ही भक्ति आएगी। भक्ति और प्रीति से ही गुणों को धारण कर सकेंगे।
उपाध्याय भगवंत ने कहा कि एक स्वार्थी लोभी व लालची व्यक्ति दूसरे का हित नहीं कर सकता। सभी ऐसा ही जीवन जी रहे हैं जहां इच्छा पूर्ति होगी तो उससे राग करो और जहां इच्छा की उपेक्षा हो उससे लड़कर द्वेष करो। इसी के चक्कर में पूरी जिंदगी निकल जाती है। बुद्धि होने से समझ आ जाता है लेकिन शुद्धि नहीं होने से भावना समझ में नहीं आती। इसलिए मनुष्य भव में भोग व हिंसा होती रहती है।
उपाध्याय भगवंत ने कहा कि गुणवान मित्र ही हमें जीवन में बनाना चाहिए। जिसमें विनय, सरलता, नैतिकता, इंसानियत, सदाचार, दया हो। परमात्मा और गुरु के प्रति समर्पण हो। ऐसे गुणवान मित्र के अंदर के गुण को देखना है और उन्हें पाना है। जो इस दुनिया में दुर्लभ है और इस संसार में गुण होना बड़ा दुर्लभ है। ऐसे लोग परमात्मा के मंदिर, गुरु के उपाश्रय और सत्संग में भी कुछ ही मिलेंगे। किसी का गुण देखो तो उसके प्रति आकृष्ट हो जाना चाहिए। माता-पिता और बड़े जो अनुभवी हो उनसे मित्रता होनी चाहिए।
