जो नहीं करना था, आखिर वही किया…

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इस बात से कोई इंकार नहीं कर सकता कि कांग्रेस को संगठन के तौर पर मजबूत करने की जरूरत है। कांग्रेस के कई दशकों से चले आ रहे पुराने तौर तरीकों से कांग्रेस का संगठन मजबूत नहीं हो रहा था। कहने को कांग्रेस का एक संगठन तो होता है लेकिन जब भी चुनाव आते हैं तो संगठन की कमजोरी के कारण कई राज्यों में कांग्रेस चुनाव हारती रही है। चुनाव में ही पता चलता है कि कांग्रेस संगठन के तौर पर कमजोर है, इसीलिए चुनाव नहीं जीत पा रही है। कहीं किसी नेता के कारण संगठन मजबूत होता है और वह चुनाव एक बार जीत भी जाता है तो वही संगठन सरकार बनने के बाद कमजोर हो जाता है और दूसरी बार पार्टी को चुनाव जिता नहीं पाता है क्योंकि सत्ता में आते ही कांग्रेस में गुटबाजी की पुरानी बीमारी फैल जाती है और इसी कारण कांग्रेस कमजोर हो जाती है।

छत्तीसगढ़ में कांग्रेस ने एक बार जीत हासिल की तो माना गया कि यहां संगठन मजबूत है इसलिए कांग्रेस चुनाव जीत सकी। लेकिन वही कांग्रेस सरकार बनने के पांच साल के भीतर कमजोर हो गई क्योंकि संगठन के नेता व कार्यकर्ता नेताओं के गुट के हो गए।कांग्रेस में जितने बड़े नेता होते हैं, उनका अपना एक गुट होता है। बड़े नेता की कोशिश होती है कि उसके समर्थकों को विधायक की टिकट मिले, संगठन में पद मिले ताकि वह अपने इलाके में मजबूत संगठन के कारण चुनाव जीत सकें व जिता सकें।हर नेता की यही कोशिश होती है कि उसके क्षेत्र में कांग्रेस का प्रदर्शन अच्छा होना चाहिए।उसे अपने क्षेत्र की चिंता ज्यादा होती है, पार्टी की चिंता ज्यादा नहीं होती है, इसलिए भी कई बार कांग्रेस नेता के क्षेत्र में अच्छा प्रदर्शन करती है लेकिन राज्य में कांग्रेस का प्रदर्शन अच्छा नहीं होता है। इससे राज्य में नेता तो मजबूत बने रहते हैं लेकिन कांग्रेस राज्य में कमजोर हो जाती है।

छत्तीसगढ़ में पांच साल कांग्रेस की सरकार रहने के बाद तो कांग्रेस को संगठन के तौर पर और मजबूत होना था लेकिन ऐसा हुआ नहीं है। पांच साल सरकार रहने के बाद संगठन के तौर पर कमजोर हुई है और आलाकमान ने इसके लिए कांंग्रेस के बड़े नेताओं को दोषी माना है। यही वजह है कि इस बार जब कांग्रेस जिला अध्यक्षों की नियुक्ति में प्रदेश के बड़े नेताओं की भूमिका को नजरअंदाज कर दिया और पर्यवेक्षकों को भेजा गया,उनको जिम्मेदारी दी गई इस बार जो जिला अध्यक्ष बनाए जाएं, उनको सभी की सहमति से बनाया जाए यानी जिसके पक्ष में ज्यादा से ज्यादा लोग कहें कि यही ठीक है, उसे ही जिला अध्यक्ष बनाया जाए। इसके लिए पार्टी के भीतर से लेकर क्षेत्र के हर वर्ग से लोगों से बात की गई ताकि जब किसी को कांग्रेस अध्यक्ष बनाया जाए तो लोगों को लगे कि अध्यक्ष को उसने चुना है, लोगों को लगे कि जिला अध्यक्ष को हमने चुना है इसलिए यह तो हमारा अध्यक्ष है।

कांग्रेस की यह सोच तो अच्छी है कि नए तरीके से अध्यक्ष चुनने से जिला स्तर पर सामाजिक संतुलन, क्षेत्रीय संतुलन और प्रदर्शन आधारित जिम्मेदारियों को लागू करने पर गुटबाजी कम की जा सकती है और संगठन को चुस्त बनाया जा सकता है।जिला अध्यक्षों की पहुंच दिल्ली में आलाकमान तक होने से राज्य व जिले की जो बाते पहले आलाकमान तक ठीक से नहीं पहुंचती थी अब पहुंचेगी। इससे बड़े नेताओं में डर रहेगा कि अब आलाकमान तक उनकी हर बात पहुंच सकती है, इससे वह पहले जो खुलकर करते थे अब नही कर पाएंगे।

अब तक कांग्रेस में जिला अध्यक्ष चुनाव ठीक रास्ते पर था लेकिन आखिरी में दिल्ली में कांग्रेस महासचिव वेणुगाेपाल ने वही गलती कर दी जो उसे नही करनी थी। जिला अध्यक्ष के लिए जब सब कुछ हो चुका था तो प्रदेश अध्यक्ष, चरणदास महंत,टीएस सिंहदेव, भूपेश बघेल से जिला अध्यक्षों के लिए सुझाव नहीं लेना था। उनसे उनके प्रभाव वाले क्षेत्र में जिला अध्यक्ष के लिए नाम नहीं लेना था।प्रमुख नेताओं की जिला अध्यक्ष के लिए आखिरी में सलाह लेकर उनकी पूछपरख करने का परिणाम यह होगा कि जिसकों को जिला अध्यक्ष बनाया जाएगा,अब माना यही जाएगा, चर्चा यही की जाएगी कि क्षेत्र के नेता विशेष के कहने पर ही जिला अध्यक्ष बनाया गया है।

जिला अध्यक्षों के नाम सामंने आने पर कहा तो यही जाएगा कि कौन से जिला का कांग्रेस अध्यक्ष किस नेता के कहने पर बनाया गया है। कितने जिला अध्यक्ष नेता अपने समर्थकों को बनाने में सफल रहे हैं।नेताओं के कारण किन अच्छे युवाओं को जिला अध्यक्ष बनने का मौका नहीं मिला। सोशल मीडिया में अभी से जिला अध्यक्ष पद के दावेदार बहुत कुछ कह रहे हैं कि उनको नहीं बनाया जाएगा तो क्यों नहीं बनाया जाएगा। कई लोगों को कहने का मौका मिलेगा कि जब बड़े नेताओं की सलाह व सुझाव पर ही जिला अध्यक्ष बनाना था तो इसके लिए इतनी लंबी चौड़ी प्रकिर्या की जरूरत नहीं थी। यह तो कहा कुछ गया और किया कुछ गया जैसी बात हो गई।

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