शोले के 50 साल: पीढ़ियों को प्रेरित करने वाली सलीम-जावेद की अनोखी जोड़ी

0
17

मुंबई । भारतीय सिनेमा के 100 से ज्यादा साल के सफर में कई बेहतरीन स्क्रीनराइटर्स सामने आए हैं। लेकिन सलिम–जावेद जैसी पहचान और विरासत किसी ने नहीं बनाई। इस मशहूर जोड़ी ने कई बड़ी और यादगार फिल्में दीं, लेकिन शोले ने सच में कहानी कहने का तरीका बदल दिया। यह फिल्म हमेशा के लिए एक क्लासिक बन गई और आने वाली पीढ़ियों के स्क्रीनराइटर्स के लिए प्रेरणा बनी। 1975 में स्वतंत्रता दिवस पर रिलीज हुई, रमेश सिप्पी द्वारा निर्देशित यह शानदार एक्शन-ड्रामा आज 50 साल पूरे कर चुकी है। याद करने लायक बात है कि सलिम–जावेद ने न सिर्फ इस फिल्म से एक पहचान बनाई, बल्कि भारतीय सिनेमा को वह कहानी दी जिसे बहुत लोग “अब तक की सबसे बेहतरीन कहानी” कहते हैं।

पचास साल के सफर में, शोले सिर्फ एक फिल्म नहीं रही, बल्कि एक अलग ही पहचान बना चुकी है। मशहूर लेखक जोड़ी सलिम–जावेद द्वारा लिखी गई शोले आज भी हिंदी सिनेमा का अनमोल रत्न मानी जाती है। इस जोड़ी को हिंदी फिल्मों के इतिहास का सबसे बेहतरीन लेखक कहा जाता है, और शोले ने उनकी जगह और भी मजबूत कर दी।

सलिम–जावेद ने दर्शकों को जय और वीरू जैसी सबसे पसंद की जाने वाली ऑन-स्क्रीन जोड़ी दी, जिन्हें अमिताभ बच्चन और धर्मेंद्र ने निभाया था। इन किरदारों के जरिए उन्होंने बॉलीवुड के असली हीरो की पहचान बनाई जैसे बहादुर, वफादार और दिल से नेक। हीरो के साथ-साथ, सलिम–जावेद ने हिंदी सिनेमा के सबसे मशहूर विलन गब्बर सिंह को भी गढ़ा, जिसे अमजद खान ने अमर कर दिया। शायद ही कोई और फिल्म हो, जिसमें विलन हीरो जितना मशहूर और पसंदीदा बना हो।

 

इसके अलावा, उन्होंने हीरोइनों को भी अपनी अलग पहचान देना नहीं भूला। बसंती और राधा, जिन्हें हेमा मालिनी और जया भादुरी ने निभाया, सिर्फ वीरू और जय की प्रेमिका नहीं थीं बल्कि वे अपने आप में भी यादगार किरदार बन गईं।

 

अब, शोले का सबसे खास और अहम पहलू थे उसके डायलॉग्स। चाहे हीरो हों, विलेन हो या फिर हीरोइन, हर किसी को ऐसे डायलॉग दिए गए जो आज भी याद किए जाते हैं। जैसे गब्बर सिंह का – “कितने आदमी थे?”, “जो डर गया, समझो मर गया।” “अरे ओ सांभा, कितना इनाम रखे हैं सरकार हम पर?”, “ये हाथ हमको दे दे ठाकुर।” “तेरा क्या होगा कालिया?”, जय का – “तुम्हारा नाम क्या है बसंती?”, वीरू का – “बसंती, इन कुत्तों के सामने मत नाचना।” जय और वीरू का – “ये दोस्ती हम नहीं तोड़ेंगे।” वीरू का – “ठाकुर, ये हाथ जब तक चलेंगे, तब तक दुश्मन के सांस चलेंगे।” और गब्बर सिंह का – “और सुन चम्मक छल्लो, जब तक तेरे पैर चलेंगे तब तक उसकी सांस चलेगी, पैर रुके तो बंदूक चलेगी।” ये सारे डायलॉग्स एक विरासत बन गए हैं और आज भी ताज़ा लगते हैं।

आखिर में, सलीम–जावेद ने भारतीय सिनेमा को एक ऐसी कल्ट क्लासिक दी है जो अब अपना गोल्डन जुबली मना रही है। यह कहना बिल्कुल सही होगा कि यह फिल्म उस विरासत का चमकता उदाहरण है जो इस आइकॉनिक जोड़ी ने बनाई, एक ऐसी फिल्म जिसे हर पीढ़ी को देखना चाहिए।

0Shares

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here