बीरन उत्सव : प्रकृति, कला और संस्कृति का संगम

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कवर्धा । भुरसीपकरी (दलदली) में रविवार को बैगा समुदाय की परंपरागत विरासत, बीरन पारंपरिक आभूषण, कला, संस्कृति और पहचान को संरक्षित करने एक विशेष आयोजन “बीरन उत्सव : प्रकृति, कला और संस्कृति का संगम” का भव्य आयोजन किया गया।

बैगा समाज की सांस्कृतिक परंपराओं को संरक्षित करने, उनकी कलात्मक विधाओं को महत्व देने और समुदाय-केंद्रित विकास चिंतन को आगे बढ़ाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम सिद्ध हुआ।

कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में पद्मश्री अर्जुन सिंह तोतडिया उपस्थित थे। तोतड़िया लोक कला और जनजातीय संस्कृति के क्षेत्र में देशभर में प्रतिष्ठित हैं। उन्हें राष्ट्रीय तुलसी सम्मान, जनजातीय गौरव सम्मान, संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार, भारत राष्ट्र सम्मान जैसे महत्वपूर्ण राष्ट्रीय-सांस्कृतिक सम्मान प्राप्त हैं। पूरे समारोह में एक नई ऊर्जा और उत्साह का संचार किया। उनके साथ बैगा समाज के सामाजिक नेतृत्वकर्ता बुद्धसिंह सुटकुरिया, लमतु सिंह बगदरिया, इतवारी मछिया, मोती कचनरिया, तुलसी सुरखिया, गौठुराम बरंगिया, बिहारी रठुड़िया के द्वारा विधि विधान से कार्यक्रम की शुरुआत नागा बैगा–नागा बैगीन पूजन से आरंभ हुई।

पारंपरिक ढोल-नगाड़ों की धुनों के साथ बैगा कर्मा नृत्य ने उत्सव को जीवंत और ऊर्जावान वातावरण प्रदान किया। इन प्रस्तुतियों ने न केवल बैगा समाज की कलात्मकता को प्रदर्शित किया बल्कि उपस्थित सभी अतिथियों को जनजातीय संस्कृति की वास्तविक जड़ों से जोड़ दिया। कार्यक्रम में जिला प्रशासन, जिले के विभिन्न शासकीय विभाग एवं विभिन्न सामाजिक संगठनों के साथियों ने भी उत्साहपूर्वक भाग लिया।

बैगा समुदाय के सांस्कृतिक संरक्षण और उनके पारंपरिक कौशल को संरक्षण, आजीविका एवं रोजगार से जोड़ने की दिशा में सामुदायिक और संस्थागत सहयोग महत्वपूर्ण है।

उत्सव को संबोधित करते हुए तोतडिया जी ने कहा कि बैगा समुदाय की सांस्कृतिक परंपरा और प्रकृति से उनका गहरा संबंध बैगा की पहचान और प्रामाणिक धरोहरों में से एक है।

उन्होंने कहा कि पारंपरिक कलाओं को संजोना, उन्हें नया मंच प्रदान करना और युवा पीढ़ी को इनसे जोड़ना आज समय की महत्वपूर्ण आवश्यकता है। उन्होंने बैगा समुदाय के प्रयासों की सराहना करते हुए आशा व्यक्त की कि ऐसे आयोजन भविष्य में विस्तृत स्वरूप में सामने आएँगे। बैगा समाज प्रमुख बुद्धसिंह सूटकुरिया ने कहा बीरन केवल एक आभूषण नहीं बल्कि बैगा समुदाय की सामाजिक गरिमा, आध्यात्मिक और सांस्कृतिक पहचान का प्रतीक है। विशेष अवसरों, पर्वों, अनुष्ठानों और सामाजिक आयोजनों में इसका महत्वपूर्ण स्थान है। बैगा समाज प्रमुख मोती कचनरिया ने कहा बीरन की उपयोग एवं विपणन की आवश्यकता बीरन जैसी पारंपरिक कलाओं को शासकीय कार्यक्रमों एवं विभिन्न स्थानों तक पहुँचाने की आवश्यकता है। बैगा समुदाय की कला को उचित सम्मान मिले, तो इससे न केवल समुदाय को आर्थिक मजबूती प्राप्त होगी बल्कि एक पारंपरिक कला वैश्विक पहचान भी पा सकेगी। समाज प्रमुख लमतु सिंह बगदरिया ने बीरन का समाज में सामाजिक महत्व एवं बीरन हस्तशिल्प की पूरी प्रकिया को बताया। जिसमें सामाजिक प्रतिष्ठा का प्रतीक,पहचान का चिह्न, वैवाहिक एवं पारिवारिक परंपराओं का हिस्सा और पारंपरिक ज्ञान का जीवित रूप मानी जाती है। यही कारण है कि इसे संरक्षित करना और अगली पीढ़ियों तक ले जाना अत्यंत आवश्यक है। अंत सभी का आभार व्यक्त करते हुए इतवारी मछिया ने कहा “बीरन उत्सव” केवल एक सांस्कृतिक आयोजन नहीं, बल्कि परंपरा के संरक्षण, कला की पहचान, समुदाय की एकजुटता और सांस्कृतिक आत्मविश्वास का प्रतीक बनकर सामने आया। सांस्कृतिक संपदा न केवल धरोहर है, बल्कि समूचे समाज की सांस्कृतिक विरासत का अभिन्न हिस्सा है। बीरन उत्सव में बीरन को संरक्षण एवं संवर्धन करने के लिए बीरन बनाने वाली बैगा महिला को चेक वितरण किया गया।

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