एक तिहाई भारतीय पशुपालक दूध नहीं, पोषण और खेती को देते हैं प्राथमिकता: सीईईडब्ल्यू

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नई दिल्ली । भारत में पशुपालन को केवल दूध उत्पादन और बिक्री से जोड़कर देखना जमीनी हकीकत को पूरी तरह नहीं दर्शाता। काउंसिल ऑन एनर्जी, एनवायरनमेंट एंड वॉटर (सीईईडब्ल्यू) के ताज़ा अध्ययन में सामने आया है कि देश के एक तिहाई से अधिक पशुपालक दूध की बिक्री नहीं करते, बल्कि पशुपालन को परिवार के पोषण, खेती और अन्य गैर-बाजारिक लाभों के लिए प्राथमिकता देते हैं।

सीईईडब्ल्यू द्वारा 15 राज्यों में 7,300 से अधिक पशुपालकों पर किए गए इस सर्वेक्षण में देश के 91 प्रतिशत मवेशी समूह (गाय, भैंस और बैल) शामिल किए गए हैं। अध्ययन के अनुसार, करीब 38 प्रतिशत पशुपालक दूध बेचने के बजाय पारिवारिक उपभोग, गोबर से खाद और ईंधन, तथा खेतों की जुताई जैसे कार्यों के लिए पशुपालन करते हैं। वहीं लगभग 7 प्रतिशत पशुपालक ऐसे हैं, जो दूध उत्पादन को पूरी तरह छोड़कर गोबर, जुताई या मवेशियों की बिक्री से आय को प्राथमिकता देते हैं। पश्चिम बंगाल और महाराष्ट्र जैसे राज्यों में ऐसे पशुपालकों का अनुपात लगभग 15 प्रतिशत तक है।

गोबर और कृषि कार्यों में मवेशियों की अहम भूमिका

अध्ययन बताता है कि लगभग 74 प्रतिशत पशुपालक गोबर को खाद, ईंधन या बिक्री के लिए बेहद महत्वपूर्ण मानते हैं। खासकर झारखंड, पश्चिम बंगाल और हिमाचल प्रदेश जैसे राज्यों में आधे से अधिक पशुपालक दूध की बिक्री की बजाय घरेलू खपत और गोबर के उपयोग को तरजीह देते हैं। यहां तक कि महाराष्ट्र और कर्नाटक जैसे संगठित डेयरी राज्यों में भी 30 प्रतिशत से अधिक पशुपालक मवेशियों से मिलने वाले गैर-दुग्ध लाभों को अधिक महत्व देते हैं।

जलवायु परिवर्तन बढ़ा रहा है पशुपालन की चुनौतियां

सीईईडब्ल्यू अध्ययन में यह भी सामने आया है कि जलवायु परिवर्तन पशुपालन को गंभीर रूप से प्रभावित कर रहा है। भैंस पालने वाले 54 प्रतिशत, संकर नस्ल के मवेशी पालने वाले 50 प्रतिशत और देसी नस्ल के मवेशी पालने वाले 41 प्रतिशत पशुपालकों ने मवेशियों में बीमारी, मृत्यु और गर्मी से होने वाली बेचैनी जैसी समस्याओं को जलवायु परिवर्तन से जोड़ा है। हालांकि देसी नस्ल के मवेशी अपेक्षाकृत अधिक सहनशील माने जाते हैं, फिर भी कई पशुपालक अधिक दूध उत्पादन के लिए संकर नस्ल और भैंसों की ओर झुकाव दिखा रहे हैं, जिससे भविष्य में जोखिम बढ़ सकता है।

चारे की कमी सबसे बड़ी समस्या

अध्ययन के अनुसार, चार में से तीन पशुपालक चारे और भूसे की कमी को सबसे बड़ी चुनौती मानते हैं। अधिकांश राज्यों में चारे की महंगाई, चारागाहों का सिकुड़ना और कम भूमि उपलब्धता समस्या को और गंभीर बना रही है। इसके बावजूद, साइलेज निर्माण और राशन संतुलन जैसे उपायों के प्रति जागरूकता बेहद कम है। करीब 80 प्रतिशत पशुपालक इन योजनाओं से अनजान हैं और इनका अपनाने का स्तर मात्र 5 प्रतिशत है।

नीतियों में बदलाव की जरूरत

सीईईडब्ल्यू के फेलो और डायरेक्टर अभिषेक जैन ने कहा कि भारत की डेयरी नीतियां मुख्य रूप से दूध उत्पादन पर केंद्रित हैं, जबकि जमीनी स्तर पर पशुपालन एक बहुआयामी आजीविका तंत्र है। उन्होंने अलग-अलग राज्यों और पशुपालकों की जरूरतों के अनुरूप लक्षित और लचीली नीतियों की आवश्यकता पर जोर दिया।

वहीं, सीईईडब्ल्यू की प्रोग्राम एसोसिएट रुचिरा गोयल ने कहा कि चारे की बेहतर आपूर्ति श्रृंखला और स्थानीय जरूरतों के अनुसार समाधान अपनाकर छोटे पशुपालकों को तत्काल राहत दी जा सकती है। उन्होंने हाइड्रोपोनिक्स, अजोला खेती और चारागाह संरक्षण जैसे उपायों में निवेश की सिफारिश की।

छोटे पशुपालकों की बड़ी भूमिका

रिपोर्ट के मुताबिक, ग्रामीण भारत में आधे पशुपालकों के पास केवल एक या दो मवेशी हैं। ये छोटे पशुपालक कुल दूध उत्पादन में 29 प्रतिशत और कुल दूध बिक्री में 22 प्रतिशत का योगदान देते हैं। इसके बावजूद बाजार में बिकने वाले अधिकांश दूध का उत्पादन मध्यम और बड़े पशुपालकों द्वारा किया जाता है।

सीईईडब्ल्यू की रिपोर्ट का निष्कर्ष है कि राष्ट्रीय पशुधन मिशन और राज्य स्तरीय योजनाओं को क्षेत्रीय और पशुपालक-विशिष्ट जरूरतों के अनुसार ढालने की आवश्यकता है, ताकि पशुपालन न केवल अधिक उत्पादक बल्कि जलवायु परिवर्तन के प्रति अधिक resilient और सतत बन सके।

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