नई दिल्ली । आवारा कुत्तों से जुड़ी याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने पूर्व केंद्रीय मंत्री मेनका गांधी की कुछ सार्वजनिक टिप्पणियों पर कड़ी आपत्ति जताई। अदालत ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि बिना सोचे-समझे दिए गए बयान न्यायपालिका के प्रति अवमानना की श्रेणी में आ सकते हैं। पीठ ने यह भी रेखांकित किया कि आवारा कुत्तों की समस्या भावनाओं से नहीं, बल्कि ठोस प्रशासनिक जिम्मेदारियों और समाधान से जुड़ा विषय है।
सुनवाई के दौरान अदालत ने संस्थागत परिसरों में आवारा कुत्तों की मौजूदगी, नगर निगमों की भूमिका और कचरा प्रबंधन की विफलताओं पर गंभीर चिंता जताई। वकीलों ने दलील दी कि समय पर कचरा न उठने के कारण कुत्तों की संख्या बढ़ रही है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि शहरीकरण के साथ कचरे में वृद्धि हुई है, लेकिन उसका समुचित प्रबंधन नहीं हो पा रहा, जिसकी सीधी जिम्मेदारी स्थानीय निकायों की है।
कोर्ट ने वकील से पूछे तीखे सवाल
मेनका गांधी की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता राजू रामचंद्रन से न्यायमूर्ति संदीप मेहता ने तीखे सवाल पूछे। अदालत ने जानना चाहा कि पशु अधिकार कार्यकर्ता और मंत्री रहने के दौरान बजटीय आवंटन, नसबंदी और कचरा प्रबंधन को लेकर ठोस पहल का उल्लेख याचिका में क्यों नहीं है। पीठ ने यह भी सवाल उठाया कि सार्वजनिक मंचों और पॉडकास्ट में दिए गए बयानों के प्रभाव पर विचार क्यों नहीं किया गया।
कोर्ट ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट के आदेशों पर सार्वजनिक रूप से की गई टिप्पणियां अवमानना के दायरे में आ सकती हैं। न्यायमूर्ति ने यह भी पूछा कि क्या वकील ने अपने मुवक्किल की सार्वजनिक भाषा और बयानों का संज्ञान लिया है। अदालत ने साफ कहा कि बिना विवेक के सभी के खिलाफ टिप्पणी करना स्वीकार्य नहीं है। हालांकि, कोर्ट ने उदारता दिखाते हुए फिलहाल अवमानना की कार्यवाही शुरू न करने की बात कही।
सुनवाई के दौरान अजमल कसाब का संदर्भ आने पर न्यायमूर्ति विक्रम नाथ ने टिप्पणी करते हुए कहा कि कसाब ने भी अदालत की अवमानना नहीं की थी, लेकिन यहां कुछ बयानों से ऐसा आभास बनता है। कोर्ट ने संकेत दिया कि संवैधानिक पदों पर रहे लोगों से अधिक जिम्मेदारी और संयम की अपेक्षा की जाती है।
कुत्तों को खाना खिलाने को लेकर भी दलीलें रखी गईं। एक वकील ने कहा कि कुत्तों को भोजन मिलने से वे भटकते नहीं, आपसी झगड़े कम होते हैं और बीमारियों का खतरा घटता है। प्रति कुत्ता वार्षिक खर्च का भी उल्लेख किया गया और तंजानिया का उदाहरण देते हुए सहानुभूति को दंडित न किए जाने की बात कही गई। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि मानवीय दृष्टिकोण के साथ-साथ प्रशासनिक जवाबदेही और कानून का पालन सर्वोपरि है।





















