अमृत सरोवर से सजीव हुआ विकास का चित्र : महाराजपुर दर्री टोला तालाब बना आजीविका संवर्धन का आधार

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एमसीबी । छत्तीसगढ़ राज्य के मनेंद्रगढ़-चिरमिरी-भरतपुर जिले में स्थित ग्राम पंचायत महाराजपुर में अमृत सरोवर योजना के तहत निर्मित महाराजपुर-दर्रिटोला तालाब आज ग्रामीण आजीविका और सामुदायिक विकास की एक मिसाल बन गया है। लगभग 0.8 हेक्टेयर क्षेत्र में निर्मित यह तालाब न केवल ग्रामीणों के लिए जल संरक्षण का केंद्र बना, बल्कि इसने किसानों और स्व-सहायता समूहों के जीवन में खुशहाली के नए द्वार भी खोले हैं। इस कार्य की कुल लागत 06.05 लाख रुपये रही, जिसे मनरेगा के माध्यम से क्रियान्वित किया गया।

अमृत सरोवर: सिंचाई, मत्स्य पालन और हरियाली का संगम : 

महाराजपुर-दर्रीटोला तालाब का निर्माण समुदाय की सामूहिक भागीदारी से किया गया। इस परियोजना का मुख्य उद्देश्य ग्रामीण समुदाय को सिंचाई सुविधा उपलब्ध कराना और साथ ही मत्स्य पालन के माध्यम से उनकी आय के नए साधन विकसित करना था। तालाब से लगभग 10 हेक्टेयर भूमि में सिंचाई की सुविधा प्राप्त हो रही है। इस क्षेत्र में किसान अब खरीफ मौसम में धान की फसल के साथ-साथ रबी सीजन में गेहूं, मटर, आलू, टमाटर, गोभी, बैंगन, मिर्ची और अन्य हरी सब्जियों की खेती भी कर रहे हैं।

आजीविका संवर्धन से आत्मनिर्भरता की दिशा में बड़ा कदम :

तालाब निर्माण के बाद गांव के स्व-सहायता समूहों ने मत्स्य पालन को भी आजीविका के एक सशक्त माध्यम के रूप में अपनाया है। समूह के सदस्यों ने बताया कि वे हर वर्ष तालाब में मत्स्य बीज डालकर मत्स्य पालन करते हैं और सीजन के अनुसार मछलियों की बिक्री से प्रति वर्ष लगभग 25,000 रुपए की आय अर्जित कर रहे हैं। यह आय न केवल उनके परिवारों की आर्थिक स्थिति को मजबूत कर रही है, बल्कि उन्हें आत्मनिर्भर बनने की दिशा में प्रेरित भी कर रही है। पहले जहां ग्रामीण केवल मनरेगा के अकुशल श्रम कार्य पर निर्भर रहते थे, वहीं अब वे स्वयं अपनी मेहनत और सामुदायिक सहयोग से स्थायी आय के साधन बना चुके हैं।

कार्यान्वयन प्रक्रिया और सामुदायिक भागीदारी का उत्कृष्ट उदाहरण :

इस परियोजना का कार्य ग्राम पंचायत महाराजपुर और जिला मनरेगा प्राधिकरण के संयुक्त प्रयासों से पूर्ण किया गया। पंचायत प्रतिनिधियों, श्रमिकों और स्थानीय युवाओं की सक्रिय भागीदारी ने इसे सफलता के शिखर तक पहुंचाया। कार्य के दौरान जल निकासी, तालाब की परिधि मजबूत करना, मिट्टी कटाव रोकने हेतु पौधरोपण तथा सिंचाई हेतु चेक डेम जैसी व्यवस्थाएं की गईं। परिणामस्वरूप यह तालाब अब वर्षभर जल से भरा रहता है और आसपास की भूमि की उर्वरता में भी वृद्धि हुई है।

अभिसरण और योगदान से बनी मिसाल : 

अमृत सरोवर योजना का यह कार्य विभिन्न विभागों के अभिसरण से पूर्ण हुआ। मनरेगा, कृषि विभाग और मत्स्य पालन विभाग के सहयोग से इस परियोजना को व्यापक स्वरूप मिला। स्थानीय जनप्रतिनिधियों, ग्राम पंचायत सचिव, तकनीकी सहायक और ग्रामीण श्रमिकों ने समर्पण के साथ कार्य करते हुए इसे सफलता तक पहुंचाया।

परिवर्तन की कहानी: पहले और अब की : 

 

पहले इस क्षेत्र में किसानों के पास सिंचाई का कोई स्थायी साधन नहीं था। बारिश पर निर्भर खेती से उत्पादन सीमित रहता था और खेतों में केवल एक ही फसल ली जाती थी। तालाब निर्माण के बाद किसानों को वर्षभर पानी उपलब्ध रहने लगा। अब वे दो से तीन फसलें लेने में सक्षम हैं। फसलों की गुणवत्ता और उत्पादन दोनों में वृद्धि हुई है। महिलाएं स्व-सहायता समूहों के माध्यम से मत्स्य पालन और सब्जी उत्पादन में योगदान दे रही हैं, जिससे उनके परिवारों की आर्थिक स्थिति सुदृढ़ हो रही है। यह तालाब अब ग्रामीण जीवन के हर पहलू से जुड़ चुका है, जिसमें सिंचाई, मत्स्य पालन, हरियाली, और सामुदायिक एकता का प्रतीक बनकर।

ग्राम की आवाज और लाभार्थियों का अनुभव : 

ग्राम पंचायत महाराजपुर के किसानों ने बताया कि अमृत सरोवर तालाब बनने से हमारी जमीनों को नई जिंदगी मिली है। पहले केवल धान की खेती तक सीमित थे, अब हम आलू, मटर, टमाटर, गोभी, बैंगन, मिर्ची और कई प्रकार की सब्जियों की भी खेती कर रहे हैं। इससे हमारी आमदनी बढ़ी है और गांव में रोजगार के अवसर भी पैदा हुए हैं। एक लाभार्थी ने मुस्कुराते हुए कहा कि पहले हम केवल मजदूरी करते थे, अब अपने खेत में मेहनत कर खुद का उत्पादन बेचते हैं। अब हम दूसरों पर नहीं, खुद पर निर्भर हैं।

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