
वैकल्पिक ऊर्जा का आत्मनिर्भरता की दिशा में योगदान
डॉ. प्रकाश चन्द्र ताम्रकार
विभागाध्यक्ष (इंटीरियर डेकोरेशन एंड डिजाइन)
शासकीय कन्या पालीटेक्निक, रायपुर (छत्तीसगढ़)
पृथ्वी दिवस प्रतिवर्ष 22 अप्रैल को विश्व भर में वर्ष 1970 से मनाया जा रहा है । इसे पूरे विश्व में पर्यावरण सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा नागरिक आंदोलन माना गया है । इसका मुख्य उद्देश्य पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरूकता बढ़ाना, जलवायु परिवर्तन, प्रदूषण और वनों की कटाई जैसे समस्याओं के समाधान के लिए लोगों को प्रेरित करना है ।
22 अप्रैल को मनाये जाने वाले विश्व पृथ्वी दिवस की इस बार की थीम “हमारी शक्ति, हमारा ग्रह” है । इस थीम का उद्देश्य
नवीकरणीय ऊर्जा (रिन्यूएबल एनर्जी) को अपनाने और और 2030 तक स्वच्छ ऊर्जा क्षमता को तीन गुना करने पर जोर देना है ।
नवीकरणीय ऊर्जा (रिन्यूएबल एनर्जी) प्राकृतिक स्त्रोतों से प्राप्त वह ऊर्जा है जो कभी खत्म नहीं होती और प्राकृतिक प्रक्रियाओं द्वारा इसकी पुनः पूर्ति होते रहती है । यह हानिकारक कार्बन उत्सर्जन नहीं करती इसलिए इसे स्वच्छ या हरित ऊर्जा भी कहते हैं । इसके मुख्य स्त्रोत में सौर, पवन, बायोमास और भूतापीय ऊर्जा शामिल हैं ।
पर्यावरण प्रदूषणकारी गतिविधियों पर रोक लगाने इस पर दण्डात्मक कार्यवाही के बदले नवाचार से इसके उपयोग कर धनार्जन का साधन बनाने से न केवल पर्यावरण संरक्षण होगा बल्कि आत्मनिर्भरता बढ़ेगा और आय बढ़ने से जीवन स्तर में सुधार होगा।
उपरोक्त कथन के समर्थन में कुछ उदाहरणो का उल्लेख आवश्यक है ।
*कचरा प्रबंधन*
इंदौर का कचरा प्रबंधन से ही सीएन जी तैयार कर शहर के वाहनों में इसका उपयोग किया जा रहा है । ग्रीन वेस्ट से पर्यावरण अनुकूल डिस्पोजेबल प्लेट बनाई जा रही है ।
*सोलर पैनल*
ओडिशा के कटक जिला नरसिंहपुर ब्लाक के दो गांवों पूर्ण रूप से सौर संचालित गांव बने हैं । यहां का प्रत्येक घर सौर रोशनी से जगमगा रहा है बिना बिजली बिल के जो पहले विद्युत कटौती और बढ़ते बिजली बिल से परेशान रहते थे । बिजली कटौती बंद होने से बच्चे बिना रुकावट के पढ़ाई कर रहे हैं । रहवासी ग्रामीणों के जीवनस्तर में सुधार हुआ है । इंदौर के तीस हजार से अधिक छतों पर लगे सोलर संयंत्रों से 410 मेगावाट बिजली उत्पादन प्रतिदिन हो रहा है । जलूद में नगर निगम का सोलर प्लांट प्रति माह करीब 80 लाख यूनीट उत्पादन कर लगभग पांच करोड़ रुपए की बचत कर रहा है ।
*पराली*
पहले जो पराली खेतों में जला देते थे जिससे प्रदूषण फैलता था । अब पराली, गोबर और गन्ना के खोई जैसे कृषि अपशिष्ट से कंप्रेस्ड बायोगैस (सीबीजी)बनाए जा रहे हैं जो सीएनजी के साथ रसोई गैस के रूप में उपयोगी है । यह किसानों के समृद्धि, ग्रामीण विकास के साथ ही स्वच्छ ऊर्जा का आधार है। उत्तर प्रदेश के हरदोई के गांव भैलामउ में स्थित संयंत्र में लगभग 2.4 टन सीबीजी का उत्पादन प्रतिदिन हो रहा है जिसे भविष्य में 12 टन प्रतिदिन किया जा सकता है।
इस प्रकार वैकल्पिक ऊर्जा के प्रयोग से पृथ्वी के पर्यावरण में सुधार के साथ ही लोगों के जीवनस्तर में भी सुधार हो रहा है जो निश्चित रूप से आत्मनिर्भरता की दिशा में महत्वपूर्ण योगदान है ।




















