भारतीय ज्ञान परंपरा के अंतर्गत छत्तीसगढ़ का  प्राचीन इतिहास, आध्यात्मिक परंपरा, साहित्यिक एवं सांस्कृतिक विरासत

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भारतीय ज्ञान परंपरा के अंतर्गत छत्तीसगढ़ का  प्राचीन इतिहास, आध्यात्मिक परंपरा, साहित्यिक एवं सांस्कृतिक विरासत


डॉ. अजय त्रिपाठी

प्राध्यापक शासकीय अभियांत्रिकी महाविद्यालय सेजबहार रायपुर (छ.ग.)


प्राचीन भारतीय शिक्षा प्रणाली के इतिहास को देखें तो हमें गर्व होना चाहिए । भारत की ज्ञान परंपरा अत्यंत प्राचीन, समृद्ध और बहुआयामी रही है। इस परंपरा के विकास में छत्तीसगढ़ का महत्वपूर्ण योगदान रहा है। अपनी सांस्कृतिक विरासत, लोक परंपराओं, आध्यात्मिक साधना, जनजातीय ज्ञान तथा साहित्यिक धरोहर के माध्यम से छत्तीसगढ़ ने भारतीय ज्ञान प्रणाली को समृद्ध किया है। छत्तीसगढ़ की भूमि लंबे समय से ऋषियों, संतों और आध्यात्मिक साधकों की पवित्र भूमि के रूप में विख्यात रहा है। यह क्षेत्र अनेक ऋषियों और तपस्वियों की साधना स्थली रही है। माना जाता है कि माता कौशल्या का जन्म दक्षिण कोसल (छत्तीसगढ़ ) में हुआ था, जिससे यह क्षेत्र भगवान श्रीराम के ननिहाल के रूप में भी प्रसिद्ध है। घने जंगलों, नदियों और शांत प्राकृतिक परिवेश से परिपूर्ण यह क्षेत्र ध्यान, शिक्षा और आध्यात्मिक ज्ञान के प्रसार के लिए आदर्श वातावरण प्रदान करता है। इसकी समृद्ध आध्यात्मिक विरासत राज्य के सांस्कृतिक और सामाजिक जीवन को आज भी प्रभावित करती है। यहाँ की आध्यात्मिक परंपराओं ने भारतीय दर्शन, धर्म और नैतिक मूल्यों के संरक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई ।

यहाँ प्राप्त पुरातात्त्विक अवशेष, मंदिर, शिलालेख तथा मूर्तिकला भारतीय ज्ञान परंपरा की समृद्धि को प्रदर्शित करते हैं । छत्तीसगढ़ भारत के सबसे प्राचीन सांस्कृतिक क्षेत्रों में से एक है, जो अपनी समृद्ध ऐतिहासिक परंपराओं, जनजातीय विरासत, प्राचीन मंदिरों, पुरातात्विक स्थलों, लोक कलाओं और आध्यात्मिक केंद्रों के लिए प्रसिद्ध है । यह क्षेत्र प्रागैतिहासिक काल से ही बसा हुआ है और इसने नाल, शरभपुरिया, पांडुवंशी, सोमवंशी, कलचुरी और मराठा सहित कई राजवंशों का शासन देखा है ।

  • प्राचीन ऐतिहासिक विरासत

  • प्रागैतिहासिक प्रमाण

पुरातत्वीय खोजों से पता चलता है कि छत्तीसगढ़ में प्रागैतिहासिक काल से ही मानव निवास रहा है। सिंघानपुर गुफाओं और काबरा पहाड़ जैसे क्षेत्रों में पाए गए शिलाचित्र और पत्थर के औजार प्रारंभिक मानव बस्तियों और कलात्मक अभिव्यक्ति के प्रमाण प्रस्तुत करते हैं।

  • दक्षिण कोसल

प्राचीन छत्तीसगढ़ को दक्षिण कोसल के नाम से जाना जाता था और इसका उल्लेख रामायण और महाभारत महाकाव्यों में बार-बार मिलता है । परंपरा के अनुसार, यह भगवान राम की माता कौशल्या का ननिहाल था।

  • प्राचीन आध्यात्मिक एवं साहित्यिक विरासत

छत्तीसगढ़ भारत की प्राचीन सांस्कृतिक परंपराओं, लोकज्ञान, संत परंपरा तथा आध्यात्मिक चेतना का महत्वपूर्ण केंद्र रहा है। यहाँ का साहित्य और आध्यात्मिक विरासत समाज में नैतिक मूल्यों, लोकमंगल, समरसता और मानवता की भावना को सुदृढ़ करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते रहे हैं ।

  1. छत्तीसगढ़ की आध्यात्मिक विरासत

  • ऋषि-मुनियों की तपोभूमि

प्राचीन ग्रंथों और स्थानीय परंपराओं में इस क्षेत्र में ध्यान और आध्यात्मिक साधना करने वाले कई ऋषियों का उल्लेख है। जंगल और नदी तट वैदिक शिक्षा और आध्यात्मिक चिंतन के केंद्र थे। दक्षिण कोसला का शांत वातावरण ज्ञान और आत्मसाक्षात्कार की तलाश में आए तपस्वियों को आकर्षित करता था।

  • रामायण और छत्तीसगढ़

लोकमान्यताओं के अनुसार रामायण के वनवास काल में भगवान राम ने दंडकारण्य क्षेत्र में समय व्यतीत किया था, जिसका बड़ा भाग वर्तमान छत्तीसगढ़ में माना जाता है। राज्य के कई स्थानों पर भगवान राम और विभिन्न ऋषियों से जुड़ी कथाएँ संरक्षित हैं।

  • पवित्र प्राचीन मंदिर और तीर्थस्थल: छत्तीसगढ़ में कई महत्वपूर्ण धार्मिक स्थल हैं:

  1. दंतेश्वरी मंदिर – भारत के पूजनीय शक्ति पीठों में से एक ।

  2. राजीव लोचन मंदिर – एक महत्वपूर्ण वैष्णव तीर्थस्थल ।

  3. भोरमदेव मंदिर – अपनी स्थापत्य कला और आध्यात्मिक महत्व के लिए प्रसिद्ध। जिसे अक्सर “छत्तीसगढ़ का खजुराहो” कहा जाता है ।

  4. महामाया मंदिर – भक्ति का एक प्रमुख केंद्र ।

  5. डोंगरगढ़ मंदिर – देवी बंबलेश्वरी को समर्पित एक प्रमुख तीर्थस्थल ।

  6. लक्ष्मण मंदिर – सातवीं शताब्दी के भारत के सर्वश्रेष्ठ ईंटों से निर्मित मंदिरों में से एक ।

  • सिरपुर: एक महान आध्यात्मिक और शैक्षिक केंद्र

छठी और आठवीं शताब्दी ईस्वी के बीच सिरपुर प्राचीन भारत के सबसे महत्वपूर्ण आध्यात्मिक केंद्रों में से एक के रूप में उभरा। यह हिंदू धर्म, बौद्ध धर्म और जैन धर्म का मिलन स्थल बन गया, जो धार्मिक सद्भाव की भावना को दर्शाता है।

  1. छत्तीसगढ़ की साहित्यिक विरासत

  • लोक साहित्य

छत्तीसगढ़ का लोक साहित्य अत्यंत समृद्ध और जीवंत है। यह मुख्यतः मौखिक परंपरा के माध्यम से पीढ़ी-दर-पीढ़ी संचारित हुआ है।

  • लोकगीत (सुआ गीत, करमा गीत, ददरिया, पंथी गीत)

  • लोकगाथाएँ (भरथरी, लोरिक-चंदा, अहिमन रानी)

  • लोककथाएँ एवं लोककहानियाँ

  • पहेलियाँ, लोकोक्तियाँ और मुहावरे

लोक साहित्य में जनजीवन, प्रकृति, कृषि, प्रेम, वीरता और सामाजिक मूल्यों का सुंदर चित्रण मिलता है।

  • संत साहित्य

छत्तीसगढ़ की संत परंपरा ने साहित्य को आध्यात्मिक और सामाजिक चेतना प्रदान की ।

  • गुरु घासीदास ने सत्य, समानता और मानवता का संदेश दिया ।

  • उनके उपदेशों और वाणियों ने जनसामान्य में सामाजिक सुधार और नैतिक चेतना का प्रसार किया ।

  • सतनाम साहित्य छत्तीसगढ़ की आध्यात्मिक साहित्यिक धरोहर का महत्वपूर्ण भाग है ।

  • आधुनिक साहित्य

आधुनिक काल में अनेक साहित्यकारों ने छत्तीसगढ़ी भाषा एवं हिंदी साहित्य को समृद्ध किया ।

  • पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी

  • मुकुटधर पांडेय

  • हरि ठाकुर

इन साहित्यकारों ने क्षेत्रीय संस्कृति, लोकजीवन और राष्ट्रीय चेतना को अपनी रचनाओं में अभिव्यक्त किया।

  • सांस्कृतिक विरासत

    • जनजातीय संस्कृति

  • छत्तीसगढ़ में गोंड जनजाति, बैगा जनजाति, मुरिया जनजाति और हल्बा जनजाति जैसी कई जनजातीय समुदाय निवास करते हैं । उनके रीति-रिवाज, त्योहार, नृत्य और पारंपरिक ज्ञान राज्य की सांस्कृतिक पहचान का अभिन्न अंग हैं ।

    • लोक नृत्य और संगीत

लोकप्रिय लोक नृत्यों में शामिल हैं: पंथी नृत्य, रौत नाचा, कर्मा नृत्य, सुआ नृत्य एवं गौर नृत्य । इन प्रस्तुतियों में मंदार, ढोल, तिमकी और बांसुरी जैसे पारंपरिक वाद्ययंत्रों का प्रयोग किया जाता है ।

  • त्यौहार

प्रमुख सांस्कृतिक त्यौहारों में शामिल हैं: बस्तर दशहरा – विश्व में सबसे लंबे समय तक चलने वाले दशहरा समारोहों में से एक, मडाई महोत्सव, राजिम कुंभ, हरेली महोत्सव, तीजा महोत्सव, परंपरागत कला एवं शिल्प

  • राज्य निम्नलिखित के लिए प्रसिद्ध है: ढोकरा कला, मिट्टी की मूर्तियां, बांस शिल्प, लकड़ी की नक्काशी, आदिवासी चित्रकला एवं हस्तशिल्प

  • संत परंपरा और सामाजिक चेतना

छत्तीसगढ़ की संत परंपरा ने जाति-पांति, भेदभाव और सामाजिक कुरीतियों के विरुद्ध जनजागरण किया ।

  • सतनाम पंथ

  • कबीर पंथ

  • विभिन्न लोक-संतों की परंपराएँ

छत्तीसगढ़ ने विश्व को अनेक संत दिए हैं जिनमे से गुरु घासीदास छत्तीसगढ़ के सबसे पूजनीय आध्यात्मिक नेताओं में से एक हैं । उन्होंने सत्य, समानता, अहिंसा और सामाजिक सद्भाव का उपदेश दिया। उनकी शिक्षाओं से सतनाम आंदोलन का उदय हुआ, जो आज भी लाखों लोगों को प्रेरित करता है । गुरु बालकदास ने गुरु घासीदास की शिक्षाओं को आगे बढ़ाया और सामाजिक सुधार और आध्यात्मिक जागृति में महत्वपूर्ण योगदान दिया ।

  • आदिवासी आध्यात्मिक परंपराएं

छत्तीसगढ़ के आदिवासी समुदायों ने प्रकृति पूजा पर आधारित प्राचीन आध्यात्मिक प्रथाओं को संरक्षित रखा है। वन, पर्वत, नदियाँ और पवित्र उपवन दिव्य शक्ति के प्रतीक के रूप में पूजनीय हैं। ये परंपराएं मनुष्य और प्रकृति के बीच सामंजस्य पर जोर देती हैं और भारत की स्वदेशी ज्ञान प्रणालियों का एक महत्वपूर्ण घटक हैं।

  • भारतीय ज्ञान परंपरा में योगदान:

छत्तीसगढ़ का साहित्य और आध्यात्मिक परंपरा भारतीय ज्ञान प्रणाली के लिए निम्नलिखित में योगदान दिया है:

  1. वैदिक और दार्शनिक परंपराओं का संरक्षण ।

  2. धार्मिक सहिष्णुता और सह-अस्तित्व को बढ़ावा देना ।

  3. नैतिक और सामाजिक मूल्यों का विकास ।

  4. पारंपरिक पारिस्थितिक ज्ञान का संरक्षण ।

  5. लोक साहित्य, संगीत और सांस्कृतिक प्रथाओं का संवर्धन ।

  6. गुरु-शिष्य परंपरा का संरक्षण ।

  7. आध्यात्मिक उन्नयन ।

अतः उक्त बातों से इस निष्कर्ष पर निकला जा सकता है की छत्तीसगढ़ की प्राचीन ऐतिहासिक, साहित्यिक अध्यात्मिक एवं सांस्कृतिक विरासत,  आदिवासी परंपराओं, धार्मिक विविधता, कलात्मक उत्कृष्टता और आध्यात्मिक मूल्यों का अनूठा संगम है। इसके पुरातात्विक खजाने, मंदिर, त्यौहार और जीवंत सांस्कृतिक प्रथाएं इसे भारत की सभ्यतागत विरासत का एक महत्वपूर्ण केंद्र बनाती हैं। छत्तीसगढ़ की विरासत प्रागैतिहासिक बस्तियों से लेकर एक जीवंत आधुनिक समाज तक की निरंतर सांस्कृतिक यात्रा का प्रतिनिधित्व करती है। छत्तीसगढ़ संतों, धर्मगुरुओं और आध्यात्मिक परंपराओं का एक उल्लेखनीय केंद्र है। दक्षिण कोसला की प्राचीन विरासत और सिरपुर की आध्यात्मिक भव्यता से लेकर गुरु घासीदास की शिक्षाओं और आदिवासी समुदायों की जीवंत परंपराओं तक, राज्य ने भारत की आध्यात्मिक और सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित और समृद्ध करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। इसकी विरासत सत्य, सद्भाव, करुणा और प्रकृति के प्रति सम्मान के मूल्यों को प्रेरित करती रहती है है। लोक साहित्य, संत परंपरा, धार्मिक केंद्रों और सामाजिक चेतना के माध्यम से इस प्रदेश ने भारतीय ज्ञान परंपरा को समृद्ध किया है। यहाँ की सांस्कृतिक और आध्यात्मिक परंपराएँ आज भी मानवता, समरसता, लोकमंगल और आध्यात्मिक विकास का मार्ग प्रशस्त करती हैं।। इसके ऐतिहासिक स्मारकों, आदिवासी परंपराओं और लोक कलाओं का संरक्षण एवं संवर्धन भारत की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को समझने हेतु आवश्यक है, जिसके लिए नवीन शिक्षा नीति 2020 का महत्वपूर्ण योगदान रहेगा ।

 

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