आवारा कुत्ते हैं तो बड़ीं समस्या….

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शहर बड़ा हो जाता है तो उसकी समस्या भी बड़ी हो जाती है। नगर महानगर बन जाता है तो उसकी समस्या भी महासमस्या बन जाती है। समस्या बड़ी हो जाती है, समस्या समय रहते हल न किए जाने पर महासमस्या बन जाती है तो उसका समाधान मुश्किल होता है।उसमें वक्त लगता है।कुत्ते कभी समस्या बन जाएंगे यह तो गंभीरता से सोचा नहीं गया।लेकिन कुत्तों की संख्या जब ज्यादा हो जाती है तो वह समस्या बन जाते हैं। नगर हो या महानगर हो, वहां कुत्तों की बढ़ती संख्या समस्या हो गई है क्योंकि वह अब शहर मेें हजारों व पूरे प्रदेश में लाख से ज्यादा हो गई है।

वह रहते आदमियों की बस्ती में,आदमियों के शहर में,खाना भी उनको आदमी देता है और वह उन्हीं को काटते हैं तो आदमी को बुरा तो लगता है कि कुत्ते रोज आदमियों को काटते हैं।खबरों से पता चलता है कि रोज शहर में पचास लोगों को कुत्ते काटते हैं साल मे हजारों लोगों को काटते हैं तो समस्या गंभीर लगती है।आदमी को समस्या गंभीर लगती है तो वह चाहता है कि उसका समाधान नगर निकाय करे, नगर निकाय न करे तो सरकार करे लेकिन होता क्या है कि कई बार आदमी को जो समस्या गंभीर लगती है, वह समस्या नगर निकाय के महापौर व पार्षदों को गंभीर नहीं लगती है। सरकार यह सोच कर पल्ला झाड़ लेती है कि यह तो नगर निकाय की जिम्मेदारी है,नगर निकाय अपनी जिम्मेदारी नहीं समझते हैं तो कुछ लोग न्याय के लिए सुप्रीम कोर्ट चले जाते हैं।

सुप्रीम कोर्ट का काम है कि कोई उसके पास समस्या लेकर आया है तो वह बताए कि समस्या का समाधान कैसे हो सकता है।आदमी को अच्छा लगा कि उसकी समस्या को सुप्रीम कोर्ट ने गंभीर माना और फैसला सुना दिया है कि कि स्कूल, कालेज, अस्पताल, बस स्टैंड,रेल्वे स्टेशन इन जगहों से कुत्तों को आठ सप्ताह में हटाएं।सुप्रीम कोर्ट ने साफ कह दिया है कि राज्य व केंद्र शासित प्रदेश दो सप्ताह के भीतर ऐसे संस्थानों की पहचान करें और संस्थाऩों के प्रमुख ऐसी व्यवस्था करें कि संस्थानों के परिसर में कुत्ते प्रवेश न कर सकें। यह पूरा काम संस्थानों का आठ सप्ताह में पूरा करना है।नगर निकाय ऐसे सभी परिसरों की हर तीन माह में निरीक्षण करे कि किसी परिसर में आवारा कुत्ता तो नहीं है।

कुत्तों को हटाने के साथ ही उसको टीका लगाना है और शेल्टर होम में रखना है और उसे खाना भी देना है।यानी कि नगरीय निकाय जो कुत्तों का गंभीर समस्या ही नहीं समझती है उसे सुप्रीम कोर्ट को दो माह में कुत्तों की समस्या का समाधान कुछ परिसरों में तो करके दिखाना भी है। आम लोग तो सुप्रीम कोर्ट के फैसले से खुश हैं कि सुप्रीम कोर्ट ने तो उसकी समस्या को गंभीर माना। अब समस्या का समाधान कैसे हो यह नगरीय निकाय को सोचना है क्योंकि उसे ही सुप्रीम कोर्ट को बताना है कि आपने जिस समस्या का समाधान करने को कहा था, हमने कैसे किया है।गेंद नगरीय निकायों के पाले में है।

नगरीय निकाय के लिए इस समस्या का समाधान करना बहुत मुश्किल लगता है क्योंकि इसके लिए स्टाफ चाहिए, इसके लिए फंड चाहिए।यही तो नगरीय निकाय के पास नहीं है, इसी वजह से तो नगरीय निकाय इस समस्या का समाधान कर नहीं पाए है।कई सालों में नगरीय निकाय जिस समस्या का समाधान नहीं कर पाए, उसे सुप्रीम कोर्ट ने दो माह में करने को कह दिया है।नगर निकाय के पास काम बहुत हैं, लेकिन काम करने के लिए स्टाफ नहीं है, स्टाफ रखने का मतलब होता है कि खर्चा बढ़ाना,खर्च बढ़ाने का मतलब होता है कि आय बढ़ाना और आय टैक्स आदि बढ़ाने से बढ़ सकती है,यही नगरीय निकाय नहीं करते हैं।

टैक्स बढ़ाने जनता नाराज होती है, वह पार्षदों को अगले चुनाव में हरा देती है. इसलिए निगम ऐसा काम नहीं करता है जिससे जनता उसे चुनाव में हरा दे।इसलिए वह समस्या कोई भी हो उसके समाधान का दिखावा करता है, लेकिन समस्या नगरीय निकाय में बनी रहती है। इसलिए सुप्रीम कोर्ट के फैसले से समस्या का पूरा समाधान हो पाएगा, ऐसा लगता तो नहीं है। कुत्तों के काटने की समस्या है वह तो बनी ही रहेगी।

कुत्ते को शहर मे ही रहेंगे, आदमियों के साथ ही रहेंगे।दोनों एक साथ रहेंगे तो साथ रहने से जो समस्या है वह तो बनी ही रहने वाली है।कुत्ते समस्या नहीं है, कुत्तों का काटना समस्या है। कुत्ते किसी को न काटें,इसका समाधान तो किसी के पास नहीं है। कुछ कुत्तों को आदमियों से दूर किया जा सकता है लेकिन सभी कुत्तों को कैसे दूर किया जा सकता है।सदियों से दोनों एक ही बस्ती में रहते आए हैं, एक ही शहर में रहते आए हैं।

 

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