
बिलासपुर छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने कोरबा नगर निगम के 60 दैनिक वेतनभोगी कर्मचारियों को राहत देते हुए राज्य सरकार के उस आदेश को निरस्त कर दिया है, जिसमें उनके नियमितीकरण के दावों को खारिज कर दिया गया था। अदालत ने सरकार को सभी मामलों की 180 दिनों के भीतर नए सिरे से समीक्षा करने के निर्देश दिए हैं।
सेवा में मामूली अंतराल को नहीं बनाया जा सकता आधार
जस्टिस राकेश मोहन पांडेय की एकलपीठ ने कहा कि केवल सेवा में छोटे अंतराल या वित्तीय कारणों का हवाला देकर लंबे समय से कार्यरत कर्मचारियों को उनके अधिकारों से वंचित नहीं किया जा सकता। अदालत ने इसे कर्मचारियों के साथ शोषण की स्थिति बताया।
1997 से 2000 के बीच हुई थी नियुक्ति
याचिकाकर्ता मनीष मिश्रा सहित 60 कर्मचारियों ने हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी। उनका कहना था कि उनकी नियुक्ति वर्ष 1997 से 2000 के बीच हुई थी और वे पिछले 23-24 वर्षों से लगातार सेवाएं दे रहे हैं।
सरकार ने इन आधारों पर खारिज किया था दावा
राज्य शासन ने नियमितीकरण का दावा यह कहते हुए अस्वीकार किया था कि कर्मचारियों की नियुक्ति 31 दिसंबर 1997 के बाद हुई थी और उनकी सेवा अवधि में एक माह से अधिक का अंतराल रहा है।
समान कर्मचारियों से भेदभाव नहीं किया जा सकता
सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के विभिन्न फैसलों का उल्लेख करते हुए कहा कि सरकार एक “संवैधानिक नियोक्ता” है। ऐसे में समान परिस्थितियों में कार्यरत अन्य कर्मचारियों को नियमित किए जाने के बाद इन कर्मचारियों के साथ भेदभाव नहीं किया जा सकता।
180 दिनों में लेना होगा फैसला
अदालत ने राज्य शासन और नगर निगम कोरबा को निर्देश दिया है कि सभी 60 कर्मचारियों के नियमितीकरण के दावों की निष्पक्ष समीक्षा कर 180 दिनों के भीतर निर्णय लिया जाए।
कर्मचारियों के लिए बड़ी राहत
हाईकोर्ट के इस फैसले को लंबे समय से नियमितीकरण की मांग कर रहे दैनिक वेतनभोगी कर्मचारियों के लिए बड़ी राहत माना जा रहा है।


















