प्रेस स्वतंत्रता दिवस: कलम की आज़ादी का आईना और ज़िम्मेदारी

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प्रेस स्वतंत्रता दिवस: कलम की आज़ादी का आईना और ज़िम्मेदारी

 


भूमिका:

एक स्याही की आहट
हर सुबह जब हम अख़बार खोलते हैं, न्यूज़ पोर्टल स्क्रॉल करते हैं, या न्यूज़ चैनल पर बहसें देखते हैं, तब एक बहुत बड़ा लोकतांत्रिक मूल तत्व हमारे सामने काम कर रहा होता है — प्रेस की स्वतंत्रता। यह सिर्फ पत्रकारों के लिए ही नहीं, बल्कि आम जनता की आंखें, कान और ज़ुबान बनने वाला माध्यम है। लेकिन क्या यह स्वतंत्रता आज भी उतनी ही सशक्त है, जितनी भारतीय लोकतंत्र ने वादा किया था? आज प्रेस स्वतंत्रता दिवस (World Press Freedom Day) पर हमें यह सवाल खुद से ज़रूर पूछना चाहिए।

1. प्रेस स्वतंत्रता दिवस: कब और क्यों मनाया जाता है?

3 मई को हर साल विश्व प्रेस स्वतंत्रता दिवस मनाया जाता है। इसकी शुरुआत संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा 1993 में की गई थी। इसका उद्देश्य है — दुनिया भर में पत्रकारों की स्वतंत्रता की रक्षा करना और उनके काम के महत्व को स्वीकारना।

इस दिन की नींव पड़ी थी 1991 में विंडहोक (नामीबिया) में हुई एक यूनेस्को की सेमिनार में, जहाँ “विंडहोक डिक्लेयरेशन” पारित की गई। इसमें स्वतंत्र, निष्पक्ष और विविध प्रेस की आवश्यकता को रेखांकित किया गया।

2. भारत में प्रेस की आज़ादी: संविधान से ज़मीन तक

भारतीय संविधान का अनुच्छेद 19(1)(a) हर नागरिक को “विचार और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता” देता है। इसी के तहत प्रेस को भी स्वतन्त्रता प्राप्त है — यानी सेंसरशिप से मुक्त, सत्ता की आलोचना करने का अधिकार और जनहित में सूचनाएँ देने की छूट।

लेकिन संविधान में कहीं भी “प्रेस” शब्द का सीधा उल्लेख नहीं है। इसके बावजूद भारत के सुप्रीम कोर्ट ने इसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के तहत संरक्षित माना है।

महात्मा गांधी ने एक बार कहा था:

 

“प्रेस बिना डर के, निष्पक्ष और सच बोलने वाला होना चाहिए — भले ही वो सत्ता के विरुद्ध हो।”

 

3. प्रेस की भूमिका:

लोकतंत्र का चौथा स्तंभ
लोकतंत्र के तीन प्रमुख स्तंभ — विधायिका, कार्यपालिका, और न्यायपालिका — के बाद, प्रेस को चौथा स्तंभ कहा गया है। इसकी भूमिका है:

सत्ता का मूल्यांकन करना
आमजन की समस्याएं उठाना
सच को सामने लाना
सत्ता और समाज के बीच पुल बनाना
जब प्रेस सही मायनों में स्वतंत्र और जिम्मेदार होता है, तब ही लोकतंत्र जीवित रहता है।

4. भारत में प्रेस की ज़मीनी हकीकत:

कितनी आज़ादी, कितनी बंदिशें?
हाल के वर्षों में भारत की प्रेस स्वतंत्रता रैंकिंग चिंताजनक रही है:

2024 में भारत का स्थान था: 161वाँ (RSF वर्ल्ड प्रेस फ्रीडम इंडेक्स में)।
प्रेस पर बढ़ते हमले, पत्रकारों की गिरफ़्तारी, ऑनलाइन ट्रोलिंग, सेंसरशिप और विज्ञापन की आड़ में मीडिया नियंत्रण जैसे कारण इस गिरावट के पीछे हैं।
उदाहरण:

जम्मू-कश्मीर में कई पत्रकारों पर UAPA जैसे सख्त कानून लगाए गए।
स्वतंत्र पत्रकारों की रिपोर्टिंग में बाधाएं उत्पन्न की गईं।
बड़ी मीडिया कंपनियों को सरकारी विज्ञापनों से नियंत्रित करने की रणनीति अपनाई गई।

5. पत्रकारों का जीवन:

जोखिम, संघर्ष और साहस
एक रिपोर्टर जो बाढ़ में गांव कवर कर रहा है, एक महिला पत्रकार जो बलात्कार पीड़िता की आवाज़ बनती है, या वह स्थानीय पत्रकार जो भ्रष्टाचार को उजागर करता है — ये सब नायक होते हैं, लेकिन इनके पास सुरक्षा नहीं होती।

कुछ दर्दनाक उदाहरण:

गौरी लंकेश की हत्या (2017): पत्रकारिता में असहमति की कीमत जान से चुकानी पड़ी।
शुजात बुख़ारी की हत्या (2018): कश्मीर में सच्ची रिपोर्टिंग का ख़ामियाज़ा जान गंवाकर भुगतना पड़ा।
प्रवासी मजदूरों की कहानी बताने वाले रिपोर्टरों पर केस दर्ज हुए।
इन पत्रकारों के परिवारों को न तो न्याय मिलता है, न आर्थिक मदद।

6. डिजिटल मीडिया और सोशल मीडिया:

नई आज़ादी या नया खतरा?
डिजिटल मीडिया ने सैकड़ों स्वतंत्र पत्रकारों को प्लेटफ़ॉर्म दिया, लेकिन इसके साथ ही “फेक न्यूज़”, ट्रोल आर्मी, और IT सेल्स जैसे खतरनाक पहलू भी सामने आए।

सोशल मीडिया एक ओर प्रेस की आज़ादी को लोकतांत्रिक बना रहा है, वहीं दूसरी ओर ट्रोलिंग, गालीगलौज, धमकियाँ, और चरित्र हनन का अड्डा भी बन चुका है — विशेषकर महिला पत्रकारों के लिए।

7. सत्ता बनाम प्रेस:

एक खींचतान
स्वतंत्र प्रेस सत्ता को असहज करता है — और यही उसकी पहचान है।

लेकिन जब सत्ता पत्रकारों को राष्ट्रविरोधी, अर्बन नक्सल, या देशद्रोही कहने लगती है, तब लोकतंत्र खतरे में आ जाता है।

कई बार पत्रकारों को “पक्षपाती” करार देकर चुप कराने की कोशिश होती है। और जब प्रेस को “गोदी मीडिया” कहा जाने लगे, तब आत्मावलोकन ज़रूरी हो जाता है।

8. भारतीय पत्रकारिता का उज्ज्वल पक्ष

फिर भी, तमाम दबावों के बीच कई पत्रकार, यूट्यूब चैनल्स, स्वतंत्र पोर्टल्स आज भी सच्चाई की मशाल थामे खड़े हैं:

Alt News, The Wire, Newslaundry, Scroll आदि संस्थाएं सच्ची पत्रकारिता का उदाहरण बन रही हैं।
गाँव-देहात की पत्रकारिता में भी कई साहसी आवाज़ें उभर रही हैं।

9. पत्रकारिता और जनजागरूकता:

शिक्षा की भूमिका
भारत में मीडिया साक्षरता की भारी कमी है। लोग अक्सर WhatsApp यूनिवर्सिटी को सच मान लेते हैं। इसलिए:

स्कूलों और कॉलेजों में “मीडिया साक्षरता” सिखाई जानी चाहिए।
प्रेस के अधिकार और दायित्व दोनों की जानकारी जनसामान्य तक पहुँचे।

10. समाधान की दिशा में:

हमें क्या करना चाहिए?
पत्रकारों की सुरक्षा के लिए कड़े कानून बनने चाहिए।
सरकारी विज्ञापन और मीडिया फंडिंग में पारदर्शिता होनी चाहिए।
पत्रकार संगठनों को मजबूत और स्वतंत्र बनाया जाए।
जनता को भी सच्ची खबर की मांग करनी होगी — TRP से नहीं, सच से।
फेक न्यूज़ के खिलाफ राष्ट्रीय स्तर पर जागरूकता अभियान चलें।

निष्कर्ष: कलम की धार बनी रहे

प्रेस की स्वतंत्रता कोई रियायत नहीं है, यह अधिकार है — जिसे जनता ने मीडिया को इसलिए दिया है कि वह सत्ता, समाज और खुद जनता को सच का आईना दिखा सके।

आज जब झूठ तेजी से फैलता है और सच दबाया जाता है, तब कलम की धार और अवाम की समझ ही लोकतंत्र को बचा सकती है।

आइए, आज के दिन हम सिर्फ पत्रकारों के लिए नहीं, बल्कि हर सच की तलाश में लगी आवाज़ के लिए खड़े हों। क्योंकि जब प्रेस बोलना बंद कर दे, तो समझ लीजिए — आपकी भी आवाज़ खतरे में है।

आपका भरोसा, हमारी ज़िम्मेदारी।
प्रेस की आज़ादी को सलाम।


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