क्या जस्टिस वर्मा रचेंगे स्वतंत्र भारत का इतिहास, या ये महाभियोग भी होगा ख़ारिज ?

0
376

हम बताएंगे इनसे पहले किन किन जजों के खिलाफ आया था महाभियोग

हाल के दिनों में न्यायपालिका में जवाबदेही की बात कानों-को सुनी सी लगती है, लेकिन जस्टिस यशवंत वर्मा की कथित नकदी मिलने की घटना ने इस विषय को फिर से गंभीरता से तैयार दर्जे पर ला दिया है। 2025 की मार्च में दिल्ली स्थित उनके सरकारी आवास में आग लगने के दौरान आधा जल चुका भारी रुपये का ढेर पाया गया—यह दृश्य न सिर्फ चौंकाने वाला था, बल्कि न्यायपालिका की प्रतिष्ठा पर एक गहरी चोट भी थी। अब तक देश में 1947 से अब तक 07 विभिन्न जजों के खिलाफ महाभियोग लाया गया है, लेकिन किसी को भी इस प्रक्रिया के तहत हाय नहीं जा सका है। इसकी विस्तृत जानकारी हम आपको नीचे देंगे। पहले इस पूरे प्रकरण और इसकी गंभीरता पर चर्चा कर लेते हैं।

✦
✧
✦
🪔 FESTIVE GREETINGS 🪔
Alok Pandey Festival Greetings
✨ दीपावली एवं सभी पर्वों की हार्दिक शुभकामनाएँ ✨
✺

 

तत्काल प्रभाव से, सर्वोच्च न्यायाधीश ने तीन सदस्यीय इन-हाउस जांच समिति का गठन किया, जिसने घटना की सत्य-तलाश की और “गंभीर अनियमितता” पाई। यही समिति महावियोग की सिफारिश लेकर आगे बढ़ी।

 

इसके बाद, संसद में 146 सांसदों ने वर्मा जी की बर्खास्तगी का प्रस्ताव पारित कराया, और 12 अगस्त 2025 को लोकसभा अध्यक्ष ने तीन सदस्यीय संसदीय जांच समिति गठित कर दी। वरिष्ठ न्यायाधीशों और जानकारों ने इस प्रक्रिया को “लोक का विजय” और “न्यायपालिका में सार्वजनिक विश्वास बहाल” करने वाला कदम करार दिया।

 

वहीं न्यायिक स्तर पर भी वर्मा ने सुप्रीम कोर्ट में हाथ आजमाया, यह तर्क देते हुए कि इन-हाउस प्रक्रिया में पारदर्शिता और न्याय के पैमाने असर से परे गए थे। परंतु, 8 अगस्त 2025 को सुप्रीम कोर्ट ने यह याचिका खारिज कर दी और स्पष्ट कर दिया कि प्रक्रिया “उचित और संवैधानिक” थी।

 

अभी मामला संसद के बहस और मतदान की दिशा में अग्रसर है। परंपरा यही रही है कि अदालत की प्रतिष्ठा और स्वतंत्रता का संरक्षक स्वयं न्यायपालिका हो, लेकिन जब किसी न्यायाधीश पर बदनामी या भ्रष्टाचार के आरोप आते हैं, तो जवाबदेही का दायित्व मजबूरी बन जाता है।

 

यह महाभियोग महज एक घटना नहीं, न्यायपालिका में नैतिकता और उत्तरदायित्व के सवाल का प्रतीक है। देशसत्ता—न्यायिक, विधायी, और कार्यकारी—ने मिलकर यह संदेश दिया है कि कोई भी पद सम्मान का अधिकार तभी रखता है, जब उसकी नैतिकता अटल हो। ऐसे निर्णायक समय में प्रणालीगत पारदर्शिता और निष्पक्षता ही न्याय की रक्षा कर सकते हैं।

 

न्यायपालिका में महाभियोग की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

 

वीलरसामी रमास्वामी – वे पहले सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश थे, जिनके ख़िलाफ़ स्वतंत्र भारत में सबसे पहले महाभियोग की प्रक्रिया शुरू हुई थी। उन्हें वित्तीय अनियमितताओं के आरोपों के तहत हटाने की कोशिश की गई थी, लेकिन संसद में दो-तिहाई बहुमत नहीं जुट पाया, इसलिए वह स्थायी रूप से बरकरार रहे—हालाँकि बाद में उन्हें कोई काम नहीं सौंपा गया था।

 

जस्टिस सौमित्र सेन – कोलकाता उच्च न्यायालय के इस न्यायाधीश पर सार्वजनिक निधियों के दुरुपयोग और तथ्यों में फ़रजीबाज़ी के आरोप लगे। 2011 में राज्यसभा ने उनके ख़िलाफ़ महाभियोग प्रस्ताव पारित किया, पर लोकसभा में चर्चा होने से पहले ही उन्होंने इस्तीफ़ा दे दिया।

 

पी. डी. दिनाकरण – सिक्किम उच्च न्यायालय के इस मुख्य न्यायाधीश पर भ्रष्टाचार विरोधी अभियोजन रिपोर्टों के बाद राज्यसभा में महाभियोग प्रस्ताव लाया गया था। पर उन्होंने इस्तीफ़ा दे दिया, जिससे जांच प्रक्रिया ठप पड़ गई।

 

जस्टिस जे. बी. परदिवाला – गुजरात उच्च न्यायालय में कार्यरत इस न्यायाधीश के ख़िलाफ़ 2015 में आरक्षण पर आपत्तिजनक टिप्पणी के कारण महाभियोग प्रस्ताव लाया गया था, लेकिन बाद में वह प्रस्ताव वापस ले लिया गया।

 

जस्टिस एस. के. गं‌गेल – इन पर 2015 में यौन उत्पीड़न के आरोप लगे और राज्यसभा में महाभियोग प्रस्ताव प्रस्तुत किया गया। जांच समिति ने पर्याप्त सबूत न मिलने की वजह से आगे की प्रक्रिया रोक दी गई।

 

जस्टिस सी. वी. नागार्जुन रेड्डी – आंध्र प्रदेश और तेलंगाना उच्च न्यायालय के इस न्यायाधीश के ख़िलाफ़ 2017 में महाभियोग प्रस्ताव राज्यसभा में लाया गया था, लेकिन आवश्यक सांसदों के हस्ताक्षरों में कमी के कारण वह आगे नहीं बढ़ सका।

जस्टिस दीपक मिश्रा

2018 में उन्हें चार वरिष्ठ न्यायाधीशों द्वारा प्रशासनिक पक्षपात और अन्य आरोपों के संदर्भ में महाभियोग प्रस्ताव का सामना करना पड़ा; लेकिन उस समय राज्यसभा अध्यक्ष ने इस प्रस्ताव को प्रारंभिक स्तर पर ही अस्वीकार कर दिया।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here