
नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को ₹2,000 से अधिक के चुनिंदा UPI पर्सन-टू-मर्चेंट (P2M) लेनदेन पर मर्चेंट डिस्काउंट रेट (MDR) लागू करने के केंद्र सरकार के फैसले पर अंतरिम रोक लगाने से इनकार कर दिया। हालांकि, कोर्ट ने इस व्यवस्था को चुनौती देने वाली याचिका पर केंद्र सरकार, RBI और NPCI समेत संबंधित पक्षों को नोटिस जारी किया है।
मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने मामले की सुनवाई की। अदालत ने केंद्र और अन्य संबंधित पक्षों को चार सप्ताह के भीतर जवाब दाखिल करने को कहा है। सुनवाई के दौरान अदालत ने संकेत दिया कि मामला कानूनी पहलू के साथ-साथ तकनीकी प्रकृति का भी है।
15 अक्टूबर से लागू होना है नया MDR
सरकार की नई व्यवस्था के तहत चुनिंदा ₹2,000 से अधिक के P2M UPI लेनदेन पर 0.4 प्रतिशत तक MDR लागू होगा। यह व्यवस्था 15 अक्टूबर 2026 से प्रभावी होने वाली है। ₹2,000 तक के भुगतान और सामान्य व्यक्ति-से-व्यक्ति (P2P) UPI ट्रांसफर इस MDR के दायरे में नहीं हैं।
केंद्र ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि UPI इस्तेमाल करने वाले करीब 96 प्रतिशत लोग इस शुल्क से बाहर रहेंगे।
याचिका में क्या चुनौती दी गई?
अधिवक्ता अंजन दत्ता की ओर से दायर जनहित याचिका में MDR व्यवस्था की कानूनी वैधता को चुनौती दी गई है। याचिका में केंद्र की अधिसूचना और MDR फ्रेमवर्क पर सवाल उठाते हुए कहा गया है कि इस तरह का शुल्क लगाने के लिए उचित कानूनी आधार और प्रक्रिया जरूरी है।
याचिका में UPI और RuPay डेबिट कार्ड के लिए लागू अलग-अलग शुल्क व्यवस्था पर भी सवाल उठाए गए हैं।
₹300 तक की सीमा
उपलब्ध रिपोर्टों के मुताबिक, पात्र लेनदेन पर MDR की दर 0.4 प्रतिशत तक रखी गई है और इसकी अधिकतम सीमा ₹300 तय की गई है। कुछ निर्धारित क्षेत्रों के लिए अलग शुल्क व्यवस्था भी रखी गई है।
फिलहाल सुप्रीम कोर्ट के अंतरिम आदेश के बाद इस व्यवस्था पर कोई रोक नहीं लगी है। मामले में केंद्र और अन्य पक्षों के जवाब के बाद आगे की सुनवाई होगी।



















