प्रेरक गीत- उठो! लक्ष्य को प्राप्त करो

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उठो! लक्ष्य को प्राप्त करो
विधा – प्रेरक- गीत

मातृभूमि को सब कुछ अर्पित, जीवन कर्ज चुकाया।
परम धन्य हो गई धरा पर,उस मानव की काया।।

भारत – भू पर जन्म लिए हैं,कर दें दूर बलाएँ।
कण-कण से है नाता अपना , राष्ट्र- धर्म अपनाएँ।।
संस्कृति से है देश हमारा,संस्कारी बन जाएँ।
बहे प्रेम की गंगा धारा,भगीरथ पुण्य कमाएँ।।

दृश्य निश्चय संकल्पों से तब, वशीभूत जग- माया।
परम् धन्य हो गई धरा पर, उस मानव की काया।।

ईश कृपा पर बलि – बलि जाते, उपवन सरित निहारे
प्रेम प्रसूनों,सा जो खिलते, महकाते जग न्यारे।।
लदे वृक्ष फल रहे विनयवत, सबका प्रिय वह प्यारे।
सत्कर्मों से नित आलोकित,बनते जग उजियारे।।

मानवता को शीश धरे जो,, राम- चरण सुख पाया।
परम् धन्य हो गई धरा पर, उस मानव की काया।।

शूलों को भी फूल बना दे, दिनकर मंगलकारी।
राणा – भामाशाह मित्र सम, हरते विपदा भारी।।
उठो!लक्ष्य को प्राप्त करो तुम, देखे दुनिया सारी।
वीर पुत्र से जय – जयवंता ,हो पुलकित महतारी।।

शौर्य – ओज का वैभव बढ़ता,भू- को गले लगाया।
परम धन्य हो गई धरा पर, उस मानव की काया।।

अहंकार का कंस निहत्था,अस्ति- प्राप्ति दुखकारी।
दुर्योधन दुख दंभ -दुशासन, हर युग पीड़ित नारी।।
चीख द्रौपदी आज पुकारे,आ जाओ बनवारी।
कर्मवान उठ!छद्म तोड़ पुनि,परम् कृष्ण अवतारी।।

पार्थ! लक्ष्य की प्राप्ति करो अब, गीता ज्ञान समाया।
परम् धन्य हो गई धरा पर,उस मानव की काया।।

अपनी धुन में आगे बढ़ता,कंटक दूर हटाता।
भ्रमित राह कोई हो जाए, उसको पंथ दिखाता।।
सिंध – हिन्द को हृदय रखे वो, भारत भाग्य – विधाता।
निश्चित जीवन चिंतन से ही,बन पर्वत अड़ जाता ।।

अटल हिमांशु आसमान छू, ध्वज अपना लहराया।
परम् धन्य हो गई धरा पर, उस मानव की काया।।

अमितारवि दुबे©®

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