विशेष लेख – कलम, करुणा और क्रांति: सावित्रीबाई फुले का शैक्षिक आंदोलन

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3 जनवरी – आधुनिक भारत की प्रथम शिक्षिका सावित्रीबाई फुले जी की जयंती के अवसर पर विशेष लेख


लेखिका
उर्मिला देवी उर्मि
साहित्यकार, मंच संचालिका
रायपुर, छत्तीसगढ़


सावित्रीबाई फुले आधुनिक भारत की प्रथम शिक्षिका

स्वाभिमान से जीने के लिए पढ़ाई करो

आधुनिक भारत की प्रथम शिक्षिका ,जानी -मानी़ समाज‌ सेविका और विद्रोही तेवर वाली कवयित्री सावित्रीबाई फुले जी का सशक्त जीवन सभी महिलाओं को प्रेरित करने के लिए अत्यंत प्रभावशाली है ।समाज के वंचितों, शोषितों ,पीड़ितों और महिलाओं के प्राकृतिक एवं न्यायोचित अधिकारों के लिए और उनके निराश जीवन में आशा का संचार करने की दृष्टि से सावित्रीबाई फुले जी का योगदान अनुपम माना जाता है।
18वीं और 19वीं शताब्दी में अंग्रेजों की फूट डालने की बुरी‌ नीति और षड्यंत्र के कारण समाज के झूठे ठेकेदारों द्वारा दलितों और महिलाओं पर किए जा रहे अत्याचार हद से अधिक बढ़ गए थे । इस कालखंड के पहले भाग में 3 जनवरी 1831 को एक दलित परिवार में खान्दोजी नेवसे और लक्ष्मी नेवसे दंपति के घर में एक विलक्षण कन्या रत्न का जन्म हुआ, जिसका नाम उन्होंने सावित्रीबाई रखा। सन 1840 में जब वह 9 वर्ष की थीं तभी उनका विवाह 13 वर्ष के ज्योतिराव फुले के साथ हुआ। बहुत कम‌ आयु‌ में विवाह हो जाने के कारण वे पढ़ लिख नहीं पाईं ,किंतु विवाह के पश्चात उनके पति श्री ज्योतिबा फुले ने उन्हें पढ़ना- लिखना सिखाया ।

स्वयं शिक्षा प्राप्त करने के बाद सावित्रीबाई ने पिछड़े समाज की ही नहीं बल्कि पूरे देश की पहली शिक्षिका बनने का गौरव भी प्राप्त किया ।उन्होंने अपने पति क्रांतिकारी नेता ज्योति राव फुले के साथ मिलकर लड़कियों के लिए 18 विद्यालय खोले, जिनमें से पहले और 18वें विद्यालय पुणे में आरंभ हुए। इसी क्रम में प्रातः स्मरणीया सावित्रीबाई जी देश की पहली शिक्षिका और नारी मुक्ति आंदोलन की पहली नेता बन गई थी। उनका नारा था — *शिक्षा के साथ नारी का सशक्तिकरण*
सन 1948 में उन्होंने जिस बालिका विद्यालय की स्थापना की ,उसे देश में लड़कियों के लिए आरंभ होने वाले पहले विद्यालय के रूप में गौरव प्राप्त‌ हुआ।
भारत के पहले बालिका विद्यालय की प्राचार्य और पहले किसान विद्यालय की संस्थापक श्रीमती सावित्रीबाई ने दलित वर्गों और महिलाओं को शिक्षित करने के काम को अपने जीवन का मिशन बना लिया था ।उनका उद्देश्य था -छुआछूत मिटाना, विधवाओं का पुनर्विवाह करवाना , महिलाओं की मुक्ति, दलित महिलाओं को शिक्षित करना इत्यादि। वे कहा करती थी- *अब बिल्कुल भी खाली मत बैठो /जाओ शिक्षा प्राप्त करो* । आज के समय में जहां विकासशील देश लैंगिक समानता के लिए संघर्ष कर रहे हैं, वहां अंग्रेजों के जमाने में सावित्रीबाई फुले ने अति पिछड़े वर्ग की महिला होते हुए भी समाज में व्याप्त कुरीतियों के विरुद्ध जो संघर्ष किया वह अभूतपूर्व एवं अनुकरणीय है।

सब को समान भाव से देखने की प्रवृत्ति के कारण वह ऐसी ज्ञानी बन गई थी जिसके विषय में श्रीमद् भगवद्गीता में कहा गया है —
विद्या विनय संपन्ने, ब्राह्मणे गवि हस्तिनी।
शुनि चैव श्वपाके च ज्ञानिन: समदर्शिन:।

समता मूलक समाज की स्थापना के लिए स्त्री- पुरुष दोनों को समान अवसर देने की वकालत करते हुए वे घोषणा करती हैं —
संसार की हर वह पुस्तक कचरा है , जो महिलाओं को पुरुषों की तुलना में असमानता परोसती है।
बच्चों को विद्यालय आने के लिए प्रेरित करने हेतु वह कहा करती थी —
सुनहरे दिन का उदय हुआ ,आओ प्यारे बच्चों आज/हर्ष और उल्लास से तुम्हारा स्वागत करती हूं आज।

सावित्रीबाई को आरंभिक काल से ही आगे बढ़ाने में बहुत मुश्किलों का सामना करना पड़ा ।स्कूल पढ़ने जाती थी तो लोग उन पर पत्थर मारते थे। उन पर गंदगी फेंक देते थे ।आज से 160 वर्ष पूर्व पहले गांव में शिक्षा के लिए विद्यालय की स्थापना में उन्हें अनेक कठिनाइयों का सामना करना पड़ा, किंतु वह अपने लक्ष्य से जरा भी नहीं डगमगाई। सावित्रीबाई पूरे देश की महानायिका हैं। हर धर्म ,हर जात- बिरादरी के लिए उन्होंने दिन रात काम किया। जब वह बालिकाओं को पढ़ाने जाती थी तो लोग उन पर कीचड़, पत्थर ,गोबर ,विष्ठा तक फेंक देते थे। सावित्रीबाई अपने थैले में एक साड़ी रख लेती थीं। स्कूल पहुंचकर साड़ी बदल लेती थीं। एक महिला प्राचार्य के लिए 1848 में बालिका विद्यालय चलाना कितना कठिन रहा होगा आज उसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती।
‌ समाज के पिछड़े और शोषित लोगों के उत्थान के लिए कार्य करते हुए उन्होंने अपने क्रांतिकारी पति ज्योतिबा और उनके अनुयायियों के साथ मिलकर *सत्यशोधक समाज* नामक संस्था का निर्माण किया , जिसमें महिला विभाग की प्रमुख सावित्रीबाई थीं।

सावित्रीबाई ने गर्भवती , बलात्कार पीड़ित महिलाओं के लिए *बाल हत्या प्रतिबंधक गृह* की स्थापना 28 जनवरी 1853 में की। उन्होंने 19वीं सदी में छुआछूत, सती प्रथा, बाल विवाह के साथ ही विधवा विवाह निषेध जैसी कुरीतियों के विरुद्ध अपने पति के साथ मिलकर निरंतर काम किया। विधवाओं के लिए *आश्रय स्थल* और कन्या शिशु हत्या रोकने के लिए *नवजात शिशु आश्रम* भी खोले ।
उन्होंने आत्महत्या करने जाती हुई एक विधवा ब्राह्मण महिला काशीबाई की अपने घर में डिलीवरी करवा कर उसके बच्चे यशवंत को अपने दत्तक पुत्र के रूप में पाला पोसा और पढ़ा लिखा कर उसे डॉक्टर बनाया ।सभी के लिए उनके ऐसे कृत्य प्रेरणादायक हैं।

‌ ‌ आधुनिक मराठी कविता की अग्रदूत के रूप में सम्मानित सावित्रीबाई का पहला कविता संग्रह 1854 में (जब वे मात्र 23 वर्ष की थी तब) काव्य फुले के नाम से प्रकाशित हुआ । उनकी‌ एक प्रसिद्ध कविता है , जिसमें वह सारे बंधन तोड़कर पढ़ने लिखने की प्रेरणा देती हैं। इस कविता की प्राय: उद्धृत की जाने वाली पंक्तियां हैं —
जाओ जाकर पढ़ो लिखो/
बनो आत्मनिर्भर ,बनो मेहनती। काम करो/ ज्ञान और धन इकट्ठा करो।
ज्ञान के बिना सब खो जाता है।
ज्ञान के बिना हम जानवर बन जाते हैं/इसलिए खाली न बैठो /जाओ ,जाकर शिक्षा लो।
उनकी अन्य कविताओं के ये अंश भी बहुत महत्वपूर्ण है-
छत्रपति शिवाजी को
सुबह शाम याद करते रहिए।

विद्या के अभाव में बेकार बदतर जीवन/ पशु तुल्य हाथ पैर हाथ धरे निठल्ले ना बैठो/ करो विद्या ग्रहण , अंग्रेजी पढ़ कर जाति भेद‌ की दीवारें तोड़ दीजिए।

महारानी ताराबाई लड़ाकू वीरांगना/ रणभूमि में रण चंडिका तूफानी /युद्ध भूमि में युद्ध की प्रेरणा स्रोत/आदर से सिर झुक जाता/
उसे प्रणाम करना मुझे सुहाता।

विद्या ही सर्वश्रेष्ठ धन है/ जिसके पास है ज्ञान का भंडार/ है वह ज्ञानी जनता की नजरों में*

फुले दंपति का पूरा जीवन समाज में वंचित तबके खास कर दलित और महिलाओं के अधिकारों के लिए संघर्ष में ही बीता। इसी बीच महात्मा ज्योतिबा फुले ने सन 1890 में इस असार संसार को अलविदा कह दिया ,तब सावित्रीबाई ने उनके अधूरे कार्यों को पूरा करने का संकल्प लिया और बावन कशी सुबोध रत्नाकार नामक अपनी एक पुस्तक का प्रकाशन भी किया। विभिन्न रूपों में समाज की सेवा करते हुए 10 मार्च 1897 को प्लेग के मरीजों की देखभाल के दौरान सावित्रीबाई ने इस संसार से विदा ले ली।
उनके अतुल्य योगदान के लिए तत्कालीन ब्रिटिश सरकार ने उन्हें श्रेष्ठ शिक्षिका के सम्मान से सम्मानित किया।
आधुनिक भारत में सावित्रीबाई फुले जी को महिला शिक्षा ,सामाजिक न्याय और नारीवाद की प्रतीक माना जाता है। महाराष्ट्र में उनके जन्मदिन 3 जनवरी को बालिका दिन के रूप में मनाया जाता है।
सावित्रीबाई फुले जी के द्वारा दी गई सीख के अनुसार आगे बढ़ते रहने से बेहतर समाज के निर्माण का मार्ग प्रशस्त होगा ,इसमें कोई संदेह नहीं।

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