
रायपुर बस्तर के घने जंगलों में वन विभाग और ग्रामीणों की सतर्कता से तेंदुए के दो बिछड़े शावकों को उनकी मां से मिलाने का अभियान सफल रहा। करीब 48 घंटे तक चले ‘मिशन रीयूनाइट’ में वन अमले ने लगातार निगरानी की और आधुनिक तकनीक की मदद से शावकों की गतिविधियों पर नजर रखी।
ग्रामीण बच्चों को मिला था पहला शावक
22 अगस्त को चित्रकोट रेंज के पहाड़ी वन क्षेत्र में ग्रामीण बच्चों द्वारा तेंदुए के एक शावक को उठाए जाने की सूचना वन विभाग को मिली। जानकारी मिलते ही टीम मौके पर पहुंची और रात करीब 11:20 बजे शावक को सुरक्षित अपने संरक्षण में लिया।
वन मंडलाधिकारी दीपेश कपिल के मार्गदर्शन में वन विभाग ने शावक को उसकी मां से मिलाने के लिए तड़के करीब 4 बजे घने जंगल में एक सुरक्षित स्थान पर रखा। उम्मीद थी कि मादा तेंदुआ अपने शावक को वहां से लेकर चली जाएगी। हालांकि, निगरानी के दौरान अगले दिन तक मादा तेंदुआ वहां नहीं पहुंची।
तलाश में मिला दूसरा शावक
पहले शावक की मां की तलाश के साथ ही वन विभाग ने ग्रामीणों की मदद से आसपास के इलाके में दूसरे शावक को भी ढूंढना शुरू किया। कुछ समय बाद दूसरा शावक भी सुरक्षित मिल गया।
दोनों शावकों को जंगल में सुरक्षित स्थान पर रखा गया और उनकी गतिविधियों पर नजर रखने के लिए हाई-रिजोल्यूशन ट्रैप कैमरे लगाए गए। वन अमले ने करीब 48 घंटे तक लगातार निगरानी जारी रखी।
कैमरे में दिखा मां का इंतजार खत्म होने वाला दृश्य
लगातार निगरानी के बाद सोमवार रात ट्रैप कैमरे में मादा तेंदुआ अपने दोनों शावकों के पास पहुंचती दिखाई दी। मादा तेंदुआ दोनों शावकों को अपने साथ लेकर घने जंगल की ओर चली गई।
शावकों के अपनी मां से सुरक्षित मिलने की पुष्टि के बाद वन विभाग ने राहत की सांस ली और अभियान को सफल घोषित किया।
वन्यजीव संरक्षण की मिसाल
यह पूरा अभियान वन्यजीवों के प्रति संवेदनशीलता और मानव-वन्यजीव सह-अस्तित्व की एक मिसाल बनकर सामने आया। वन विभाग ने शावकों को लंबे समय तक अपने संरक्षण में रखने के बजाय उन्हें प्राकृतिक वातावरण में उनकी मां से मिलाने को प्राथमिकता दी।
ग्रामीणों की सजगता, वन विभाग की तत्परता और ट्रैप कैमरों जैसी आधुनिक तकनीक के इस्तेमाल से दोनों नन्हे शावकों को उनका प्राकृतिक परिवार वापस मिल गया।













