
कचरे से कमाई का नया रास्ता: 2047 तक 51 अरब डॉलर के बाजार और 26 लाख रोजगार की संभावना
नई दिल्ली। भारत के शहरों में तेजी से बढ़ रहा जैविक कचरा अब केवल सफाई और प्रदूषण की चुनौती नहीं, बल्कि आर्थिक विकास, रोजगार सृजन और स्वच्छ ऊर्जा उत्पादन का बड़ा अवसर बनकर उभर रहा है। ऊर्जा, पर्यावरण एवं जल परिषद (CEEW) की एक नई रिपोर्ट के अनुसार यदि जैविक कचरे का वैज्ञानिक और व्यवस्थित प्रबंधन किया जाए तो वर्ष 2047 तक यह क्षेत्र लगभग 51 अरब डॉलर का विशाल बाजार तैयार कर सकता है।
रिपोर्ट में अनुमान जताया गया है कि जैविक कचरे के प्रभावी उपयोग से देश में करीब 26 लाख प्रत्यक्ष रोजगार सृजित हो सकते हैं। इसके साथ ही इस क्षेत्र में लगभग 24 अरब डॉलर तक का निवेश आकर्षित होने की संभावना भी व्यक्त की गई है। विशेषज्ञों का मानना है कि कचरे को संसाधन में बदलने की यह प्रक्रिया भारत की हरित अर्थव्यवस्था को नई गति दे सकती है।
अध्ययन के अनुसार देश के शहरी क्षेत्रों से प्रतिदिन लगभग 1.71 लाख टन ठोस कचरा निकलता है, जिसमें लगभग 50 प्रतिशत हिस्सा जैविक कचरे का होता है। इसमें रसोईघर का अपशिष्ट, फल-सब्जी मंडियों का कचरा, बागवानी अवशेष तथा अन्य सड़ने-गलने वाली सामग्री शामिल है। वर्तमान में इस कचरे का बड़ा हिस्सा बिना वैज्ञानिक प्रसंस्करण के ही नष्ट हो जाता है, जिससे पर्यावरणीय समस्याएं बढ़ती हैं।
रिपोर्ट बताती है कि यदि इस जैविक कचरे को खाद, बायोगैस, बायो-सीएनजी और अन्य जैव ईंधनों में परिवर्तित किया जाए, तो इससे ऊर्जा उत्पादन बढ़ेगा और रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता भी कम होगी। साथ ही लगभग 68 मिलियन टन कार्बन उत्सर्जन में कमी लाने की संभावना है, जो जलवायु परिवर्तन की चुनौती से निपटने में महत्वपूर्ण योगदान दे सकती है।
दिल्ली सरकार के पर्यावरण मंत्री मनजिंदर सिंह सिरसा ने कहा कि कचरे को संसाधन में बदलना आत्मनिर्भर भारत और ऊर्जा सुरक्षा की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। उनके अनुसार जैविक कचरे से तैयार होने वाला बायो-सीएनजी आयातित ईंधनों का प्रभावी विकल्प बन सकता है, जिससे विदेशी मुद्रा की बचत भी होगी।
रिपोर्ट में यह भी उल्लेख किया गया है कि वर्तमान में देश में लगभग 16 मंत्रालय और विभिन्न सरकारी संस्थाएं जैविक कचरा प्रबंधन से जुड़े कार्यक्रमों पर कार्य कर रही हैं। हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि बेहतर समन्वय, नीति समर्थन और स्थानीय स्तर पर मजबूत क्रियान्वयन के बिना इस क्षेत्र की पूरी क्षमता का लाभ नहीं उठाया जा सकेगा।

विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि खुले में कचरा जलाने और अव्यवस्थित निपटान के कारण शहरों में प्रदूषण और मीथेन गैस उत्सर्जन की समस्या बढ़ रही है। इसलिए स्रोत स्तर पर कचरे की अलग-अलग छंटाई, प्रभावी संग्रहण व्यवस्था और आधुनिक प्रसंस्करण इकाइयों का विकास समय की आवश्यकता बन गया है।
रिपोर्ट में सुझाव दिया गया है कि नगर निकायों को घरों, बाजारों और संस्थानों से निकलने वाले जैविक कचरे की पृथक पहचान और संग्रह सुनिश्चित करना होगा। साथ ही जैविक खाद और जैव ईंधन के लिए मजबूत बाजार तैयार करना होगा, ताकि यह क्षेत्र आर्थिक रूप से भी आत्मनिर्भर और टिकाऊ बन सके।
भारत के लिए यह केवल कचरा प्रबंधन का विषय नहीं, बल्कि रोजगार, निवेश, ऊर्जा सुरक्षा और पर्यावरण संरक्षण को एक साथ आगे बढ़ाने का अवसर है। यदि इस दिशा में ठोस कदम उठाए गए, तो आने वाले वर्षों में जैविक कचरा देश की हरित अर्थव्यवस्था का महत्वपूर्ण आधार बन सकता है।
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