बता तो दिया कि मेरा बेटा है…

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राजनीति में आपदा को अवसर मेें बदलने का हुनर सबको नहीं आता है। ऐसा नहीं है कि राजनीति में किसी नेता पर उसके परिवार पर आपदा नहीं आती है, आपदा तो नेताओं पर आती रहती लेकिन हजारों में कोई एक नेता ऐसा होता है अपने परिवार पर आई आपदा को भी अवसर में बदल लेता है। बड़े-बड़े नेताओं को यह कला नहीं आती है, बरसों तक राजनीति करने वालों को यह कला नहीं आती है लेकिन बहुत ही कम लोग ऐसे होते हैं जो आपदा को अपने लिए अवसर बना लेते हैं आपदा को ऊपर चढ़ने की सीढ़ी बना लेते हैं। खुद तो ऊपर चढ़ते हैं अपने पुुत्र के चढ़ने का इंतजाम भी कर देते हैं। अपनी जगह अपने पुत्र के लिए सुरक्षित करने का प्रयास करते हैं।

 

वैसे तो राजनीति में हर कोई अपने जिंदा रहते, पुत्र है तो उसे राजनीति में सेट कर देना चाहते हैं। इसलिए यह कोई बुरी बात नहीं मानी जाती है,कहने को जरूर राजनीति जनता की सेवा का जरिया हैं लेकिन यह एक व्यवसाथ से कम भी नहीं है, पिता चाहता है पुत्र उससे ज्यादा पैसा राजनीति में बनाए। ऐसा नहीं है कि राजनीति में सभी लोग सेवा की जगह पैसा कमाने के लिए आते हैं लेकिन सेवा करते हुए वह जरूर अपने लिए या परिवार के लिए कुछ पैसा कमा लेना चाहते हैं।कुछ लोग होते हैं जो विशुध्द रूप से पैसा कमाने के लिए आते हैं। वह अपने लिए कमाते है, परिवार के लिए कमाते हैं, पार्टी के लिए भी कमाते हैं।सबसे होशियार वही होता है तो पार्टी के लिए कमाते कमाते अपने लिए भी कमा लेता है। ऐसे लोगों की आलाकमान भी कदर करता है।

 

ऐसे नेता की आलाकमान भी कदर करता है तो ऐसा नेता मौके का फायदा उठाने में चूकता नहीं है। जब भी उसे मौका मिलता है,वह आलाकमान के कान में या पार्टी नेताओं की कान मे यह बात डालने से नहीं चूकता है कि मेरा बेटा भी मेरे समान है, किसी से नहीं डरने वाला। किसी के सामने नहीं झुकने वाला,सच के लिए लड़ने वाला। उसे राज्य की राजनीति में मेरी जगह तो मिलनी चाहिए। मैने पार्टी की जैसी सेवा की है, वैसी सेवा आनेवाले समय में मेरा बेटा भी करेगा। हर नेता आलाकमान को अपने वेेटे के लिए इतना आश्वासन तो दे ही सकता है कि वह रेस का घोड़ा है। आलाकमान को रेस के घोड़े पसंद भी है।

 

देश के एक पार्टी के आलाकमान को रेस के घोड़े बहुत पसंद है, ऐसे रेस के घोड़े पसंद हैं जो अड़ानी का नाम सुनते हैं गुस्सा हो जाते है,अडानी सामने न रहे तो भी उसका नाम लेकर दुलत्त्ती मारते लगते हैं। आलाकमान के लिए रेस का घोड़ा होने का मतलब है अडानी का कट्टर विरोधी। अडानी का नाम सुनते ही जिसके मुंह से गालियां निकलने लगे। ऐसे लोगों को तो आलाकमान बहुत पसंद करता है जो हर बात को अडानी से जोड़ देने में माहिर होते हैं।देश में कही भी किसी जगह कुछ भी हो उसके लिए अडानी दोषी है।कहीं भी अडानी को कोई काम चल रहा है तो उसका विरोध करना उसका परम कर्तव्य है।कहीं कानून के अनुसार भी अडानी का कोई काम चल रहा हो तो उसका विरोध यह कहकर करना कि यह क्षेत्र के लोगों के हित में नहीं है।

 

एक नेता को दिल्ली जाने का मौका मिला तो अपना काम निपटा कर वह कांग्रेस के आलाकमान व नेताओं से मिल भी लिए और उनके कान में बात डाल दी कि मेरे बेटा मुझसे से कम नहीं है। पीएम मोदी व गृहमंत्री उसके खिलाफ है। देश के दो सबसे बड़े नेता जिसके खिलाफ हो उसकी गिरफ्तारी तो होनी ही है। मेरा बेटा गिरफ्तार है तो गिरफ्तारी की सारी बातें झूठ हैं, एक ही बात सच है कि मेरे बेटे के खिलाफ दो बड़े नेता है, इसलिए उसे गिरफ्तार किया गया है। दोनों नेता अडानी के खिलाफ कुछ भी सहन नहीं कर सकते, इसलिए वह उस नेता के खिलाफ या उसके परिवार के किसी सदस्य के खिलाफ झूठे मामले बनाकर गिरफ्तार करवा देते हैं। मेेरे बेटे के साथ ऐसा ही हुआ, नेता ने तो आलाकमान को यकीन दिलाने का पूरा प्रयास किया है,आलाकमान कितना यकीन करता है यह तो आनेवाला समय बताएगा। क्योंकि आलाकमान के पास तो नेताओं का आना जाना लगा रहता है,सबसे आलाकमान हकीकत जानने का प्रयास करता है हो सकता है कोई नेता के बेटे की गिरफ्तारी का सच बता दे।

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