कहानी: “छोटू और जादुई पेंसिल”
कहानी शुरू होती है…
एक छोटे से गाँव में छोटू नाम का 10 साल का लड़का रहता था। छोटू बहुत होशियार था, लेकिन उसके पास ज़्यादा साधन नहीं थे। स्कूल में उसके पास बस एक पुरानी कॉपी और आधी टूटी हुई पेंसिल थी।
हर दिन वह अपने दोस्तों को नई-नई रंगीन पेंसिलों से चित्र बनाते देखता और सोचता,
“काश मेरे पास भी ऐसी पेंसिल होती!”
एक दिन स्कूल से लौटते समय रास्ते में उसे एक चमचमाती सुनहरी पेंसिल मिली। उसने उठाई तो पेंसिल अपने आप बोली,
“छोटू, मैं एक जादुई पेंसिल हूँ। जो भी तुम मेरे से बनाओगे, वो सच हो जाएगा!”
छोटू पहले तो डर गया, फिर हँसकर बोला,
“अच्छा, तो क्या मैं एक बड़ा केक बना सकता हूँ?”
उसने ज़मीन पर केक का चित्र बनाया — और पलक झपकते ही उसके सामने एक असली चॉकलेट केक था!
छोटू की आँखें चमक उठीं।
गाँव में जादू
अगले दिन छोटू ने जादुई पेंसिल से अपने गाँव में बहुत कुछ बनाया —
टूटी सड़क पर पुल, बच्चों के लिए झूले, स्कूल के लिए नई ब्लैकबोर्ड।
पूरा गाँव खुश हो गया। लोग कहते,
“ये सब कैसे हुआ?”
छोटू बस मुस्कुरा देता।
धीरे-धीरे उसकी पेंसिल से पूरे गाँव की किस्मत बदल गई।
लेकिन एक दिन गाँव के लालची व्यापारी भोलाराम को यह बात पता चली।
वह रात में छोटू के घर गया और पेंसिल चुरा ली।
लोभ का परिणाम
भोलाराम ने सोचा,
“अब मैं सोने का महल बनाऊँगा और बहुत अमीर बन जाऊँगा!”
उसने एक बड़ा महल बनाया — और सच में महल बन गया।
वह बहुत खुश हुआ। लेकिन लालच बढ़ता गया।
वह और बड़ा महल, और सोना, और हीरे-मोती चाहता था।
एक दिन उसने गलती से पेंसिल से “बिजली का बादल” बना दिया।
तुरंत आकाश में बादल गरजने लगे और बिजली उसके महल पर गिरी — सब राख में बदल गया।
पेंसिल भी गायब हो गई।
फिर से उम्मीद
सुबह छोटू उठा तो सब सुनकर दुखी हुआ, पर उसने हार नहीं मानी।
वह बोला,
“जादू तो चला गया, लेकिन मेहनत और दया का जादू अब भी मेरे पास है।”
अब वह बच्चों को सिखाने लगा कि कैसे बिना जादू के भी दुनिया बदली जा सकती है —
मेहनत, दया और समझदारी से।
धीरे-धीरे उसका गाँव सच में सुंदर और खुशहाल बन गया।
हर कोई छोटू को “गाँव का छोटा जादूगर” कहने लगा।
कहानी की सीख:
सच्चा जादू मेहनत, ईमानदारी और अच्छे कर्मों में होता है, न कि किसी चीज़ में।























