कांकेर में बदलाव की डोर: सरेंडर महिला नक्सलियों ने पहली बार बनाई राखियां

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कांकेर छत्तीसगढ़ के नक्सल प्रभावित कांकेर जिले के मुल्ला पुनर्वास केंद्र में इस बार रक्षाबंधन का पर्व बदलाव और नई उम्मीद का संदेश लेकर आया है। हिंसा का रास्ता छोड़कर मुख्यधारा में लौटे पूर्व नक्सली अब स्वरोजगार के जरिए आत्मनिर्भर बनने की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं।

मुल्ला कैंप में रह रही सरेंडर महिला नक्सलियों ने इस बार पहली बार अपने हाथों से राखियां तैयार की हैं। महिलाओं ने मिलकर 1 हजार से अधिक राखियां बनाईं, जिन्हें स्थानीय बाजारों में बिक्री के लिए भी भेजा गया।

स्वरोजगार से जुड़ रहे पूर्व नक्सली

हाल ही में विशेष कर्तव्यस्थ अधिकारी (OSD) कमलोचन कश्यप ने मुल्ला कैंप का दौरा कर पुनर्वासित पूर्व नक्सलियों से मुलाकात की और वहां चल रहे स्वरोजगार प्रशिक्षण कार्यक्रमों का जायजा लिया।

कांकेर के अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक (ASP) आकाश श्रीश्रीमाल के मुताबिक, पुनर्वास केंद्र में महिला और पुरुष सदस्यों को अलग-अलग व्यावसायिक गतिविधियों का प्रशिक्षण दिया जा रहा है। इसका उद्देश्य उन्हें सम्मानजनक आजीविका से जोड़कर आत्मनिर्भर बनाना है।

पहली बार बनाया राखी का त्योहार

पुनर्वास केंद्र में रहने वाली महिलाओं के लिए राखी बनाना सिर्फ एक स्वरोजगार गतिविधि नहीं, बल्कि उनके जीवन में बदलाव का अनुभव भी है। सुनीता कोवाची ने बताया कि जंगल में रहने के दौरान उन्होंने कभी त्योहार नहीं मनाया और न ही राखी बनाई थी। इस बार कैंप में सभी ने मिलकर राखियां तैयार की हैं और वे सुरक्षाकर्मियों व साथियों को राखी बांधकर रक्षाबंधन मनाना चाहती हैं।

शांति कोवाची ने बताया कि उन्होंने जीवन में पहली बार राखी बनाई और समूह की महिलाओं ने मिलकर महज दो दिनों में 700 से अधिक राखियां तैयार कर लीं। वहीं अन्य महिलाओं ने भी सैकड़ों राखियां बनाने का अनुभव साझा किया।

हिंसा से स्वावलंबन की ओर कदम

मुल्ला पुनर्वास केंद्र में चल रही ऐसी गतिविधियां सरेंडर कर मुख्यधारा में लौटे पूर्व नक्सलियों को नई जिंदगी की ओर बढ़ने का अवसर दे रही हैं। प्रशिक्षण, स्वरोजगार और सामाजिक गतिविधियों से जुड़कर ये लोग अब अपने भविष्य को नए सिरे से संवारने की कोशिश कर रहे हैं।

राखियों के निर्माण से लेकर उनके बाजार तक पहुंचने की यह पहल हिंसा से शांति और आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ते बदलाव की तस्वीर पेश करती है।

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