अगर है दोस्ती कीचड़ उछाल सकता है
है जिसके हाथ में सिक्का उछाल सकता है,
मगर नतीजा वो कैसे निकाल सकता है,है आफ़ताब के बस में अगर वो चाहे तो,
बना के बर्फ़ को पानी उबाल सकता है,अगर है दुश्मनी पत्थर उछालेगा मुझ पर,
अगर है दोस्ती कीचड़ उछाल सकता है,ख़ुशी किसी से सँभाली नहीं जाती है अगर,
ग़मों को फिर वही कैसे सँभाल सकता है,जो है अलाल की सूरत हर एक जानिब से,
हो जाये इश्क़ तो दुनिया खँगाल सकता है।
मुकेश कुमार सिंह
लेखक परिचय:
मुकेश कुमार सिंह ‘मुसाफ़िर’
सीनियर सेक्शन इंजीनियर (माल व सवारी डब्बा ), नागपुर /मध्य रेल
मूल निवासी :- ग्राम-सुरडुंग, भिलाई, छत्तीसगढ़
ग़ज़ल संग्रह -1) क्या पता क्या है
2) ज़लील होने तक
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