रायगढ़ में तमनार आंदोलन ने प्रशासन और कॉरपोरेट सिस्टम दोनों की परीक्षा ले ली। 18 दिनों तक चले विरोध के बाद आखिरकार जिला प्रशासन को तीन प्रमुख मांगों पर सहमति देनी पड़ी, तब जाकर ग्रामीणों ने आंदोलन समाप्त किया।
गारे पेलमा सेक्टर-1 कोल ब्लॉक का आवंटन पहले गुजरात स्टेट इलेक्ट्रिसिटी कॉर्पोरेशन लिमिटेड को किया गया था। भू-अर्जन की जटिलताओं के चलते कंपनी ने कोल ब्लॉक सरेंडर कर दिया। इसके बाद हुई नीलामी में जिंदल पावर लिमिटेड को कोल ब्लॉक मिला। भूमि अधिग्रहण को लेकर बनी असहमति के कारण जनसुनवाई कराना कठिन हो गया था।
8 दिसंबर को आयोजित जनसुनवाई के विरोध में ग्रामीणों ने आंदोलन शुरू किया, जो शनिवार को हिंसक घटनाओं में बदल गया। इसके बाद स्थिति को संभालने के लिए प्रशासन और ग्रामीणों के बीच लगातार बातचीत का दौर चला।
तीन शर्तों पर बनी सहमति
ग्रामीणों ने आंदोलन खत्म करने के लिए तीन स्पष्ट शर्तें रखीं।
पहली, जनसुनवाई को निरस्त करने की मांग, जिस पर कलेक्टर मयंक चतुर्वेदी ने सदस्य सचिव को पत्र भेजा। जिंदल पावर लिमिटेड की ओर से भी लिखित आश्वासन दिया गया।
दूसरी मांग, आंदोलन के दौरान ग्रामीणों पर दर्ज एफआईआर को निरस्त करने की थी। तमनार थाने में दर्ज पांच एफआईआर को लेकर सहमति बनने की बात सामने आई है।
तीसरी मांग, गांव के सेवारत कर्मचारियों के निलंबन को वापस लेने की थी, जिसे प्रशासन ने मान लिया।
कलेक्टर की दखल से निकला समाधान
लगभग 18 दिनों तक तहसीलदार, एसडीएम, एडीएम सहित कई अधिकारियों ने ग्रामीणों से संवाद करने की कोशिश की, लेकिन बात नहीं बन सकी। जब कलेक्टर मयंक चतुर्वेदी ने खुद मोर्चा संभाला, तब जाकर समाधान संभव हो सका।
आंदोलन ने खड़े किए बड़े सवाल
तमनार आंदोलन की खास बात यह रही कि इसका नेतृत्व किसी राजनीतिक दल ने नहीं, बल्कि खुद ग्रामीणों ने किया। इस आंदोलन ने जिले में चल रहे भूमि अधिग्रहण और कॉरपोरेट कार्यशैली पर सवाल खड़े किए हैं। ग्रामीणों का कहना है कि जिन जमीनों का अधिग्रहण किया जा रहा है, वे उनकी पुश्तैनी संपत्ति और आजीविका का एकमात्र साधन हैं।
माना जा रहा है कि तमनार आंदोलन का असर आने वाले दिनों में जिले में होने वाले अन्य भूमि अधिग्रहण और जनसुनवाई प्रक्रियाओं पर भी पड़ेगा।























