तुंगल इको-पर्यटन केंद्र बना बदलाव की मिसाल, 10 हजार से ज्यादा पर्यटक पहुंचे

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सुकमा जिले का तुंगल इको-पर्यटन केंद्र आज पुनर्वास, रोजगार और आत्मनिर्भरता की नई पहचान बनकर उभरा है। कभी उपेक्षा और वीरानी का प्रतीक रहा तुंगल अब प्राकृतिक सौंदर्य, पर्यटन और सामाजिक बदलाव का केंद्र बन गया है। जिला प्रशासन और वन विभाग की पहल से विकसित इस स्थल ने न सिर्फ पर्यटन को बढ़ावा दिया है, बल्कि कई महिलाओं की जिंदगी भी बदल दी है।

पर्यटकों की पहली पसंद बन रहा तुंगल

नगर से करीब एक किलोमीटर दूर स्थित तुंगल डेम अब बड़ी संख्या में पर्यटकों को आकर्षित कर रहा है। यहां कयाकिंग, पैडल बोट और बांस राफ्टिंग जैसी गतिविधियों की शुरुआत के बाद पर्यटन को नई पहचान मिली है। ओडिशा के मलकानगिरी सहित आसपास के क्षेत्रों से भी लोग यहां पहुंच रहे हैं।

31 दिसंबर 2025 से शुरू हुए इस इको-पर्यटन केंद्र में 25 मई 2026 तक कुल 10,369 पर्यटक पहुंच चुके हैं।

महिलाओं के लिए बना नई जिंदगी का रास्ता

तुंगल इको-पर्यटन केंद्र की सबसे खास बात यहां संचालित “तुंगल नेचर कैफे” है। यह कैफे “आत्मसमर्पण पुनर्वास महिला स्वयं सहायता समूह” की महिलाओं द्वारा संचालित किया जा रहा है। इनमें कुछ महिलाएं पूर्व नक्सली रही हैं, जबकि कुछ नक्सली हिंसा की पीड़ा झेल चुकी हैं।

कैफे में चाय, कॉफी, नाश्ता, मैगी, पास्ता और ऑर्डर पर भोजन उपलब्ध कराया जाता है। जिला प्रशासन द्वारा दिए गए प्रशिक्षण के बाद इन महिलाओं ने न सिर्फ रोजगार पाया, बल्कि आत्मविश्वास और सम्मान के साथ नई जिंदगी की शुरुआत भी की।

संघर्ष से सम्मान तक का सफर

कुहराम रामे, मुचाकी सोमे, मडकम पोज्जे, माड़वी बुदरी और कलमु पायके जैसी महिलाएं, जो कभी बंदूक और संघर्ष के माहौल में थीं, आज पर्यटकों का मुस्कुराकर स्वागत कर रही हैं। वहीं मडकम रामे, पोडियम सरोज, अनीता मुचाकी, ललिता यादव और पुनेम भरत जैसी महिलाओं ने हिंसा से बाहर निकलकर आत्मनिर्भरता की राह चुनी है।

उम्मीद और पुनर्वास की नई कहानी

तुंगल इको-पर्यटन केंद्र अब सिर्फ एक पर्यटन स्थल नहीं, बल्कि सामाजिक बदलाव और पुनर्वास का प्रतीक बन गया है। यह पहल दिखाती है कि सही अवसर, प्रशिक्षण और विश्वास मिलने पर लोग नई शुरुआत कर सकते हैं और समाज की मुख्यधारा से जुड़ सकते हैं।

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