जौहर : आत्मसम्मान की रक्षा के लिए‌‌ वीरांगनाओं का गौरवशाली अग्नि स्नान- उर्मिला देवी “उर्मि”

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जौहर : आत्मसम्मान की रक्षा के लिए‌‌ वीरांगनाओं का गौरवशाली अग्नि स्नान- उर्मिला देवी “उर्मि”


लेखिका
उर्मिला देवी “उर्मि”
साहित्यकार
रायपुर ,छत्तीसगढ़


जौहर -आत्मसम्मान की रक्षा के लिए अग्नि में सामूहिक आत्मोत्सर्ग ‌ का गौरवशाली पवित्र कृत्य है। आत्म बलिदान की इस पराकाष्ठा को कायरता कहना पाप है। जो लोग नासमझी के कारण जौहर को‌ नारियों की कायरता कहते हैं, वे धधकती अग्नि में अपनी एक उंगली 5 मिनट के लिए रखकर देखें।
भारतीय वीरांगनाओं के अदम्य आत्मसम्मान , अटूट साहस और‌ अग्नि में सर्वोच्च आत्म बलिदान का महिमाशाली कृत्य है जौहर ,जो हर सच्चे हिंदुस्तानी को आत्म सम्मान के साथ गरिमा पूर्ण जीवन जीने के लिए प्रेरित करता रहेगा।
जौहर‌ यह इतिहास का केवल‌‌ एक शब्द नहीं , भारतीय वीरांगनाओं द्वारा अपनी अस्मिता की रक्षा के लिए पूर्ण आत्म बल के साथ किया जाने वाला सामूहिक अग्नि स्नान का गौरवशाली कृत्य है जिसमें युद्ध काल में वीरांगनाएं अपने सतीत्व की रक्षा का अन्य कोई उपाय न दिखने पर अपनी पवित्र देह को अग्नि में भस्म कर लेती थीं।
जब निकृष्ट नृशंस मुगल आक्रमणकारियों द्वारा दुर्गों- किलों को अचानक चारों तरफ से घेर लेने के कारण राजाओं को अपनी पराजय निकट दिखाई देने लगती थी और स्त्रियों की अस्मिता पर संकट मंडराने लगता था , तब हमारी पूज्या वीरांगनाएं संसार के सामने यह उद्घोष करते हुए अपनी पवित्र देह को सामूहिक रूप से अग्नि में भस्म कर देती थी कि भारतीय नारी का सम्मान किसी भी साम्राज्य की विजय से बड़ा है ।‌
जौहर के पश्चात राज्य के पुरुष अपनी माताओं , बहन -बेटियों की ओर से निश्चिंत होकर युद्ध करते थे। जौहर के बाद बची हुई राख को वे अपने पूरे शरीर ‌पर लपेट कर परिवार की चिंता से मुक्त होकर देश हित में अपनी जान की बाजी लगाने के‌ लिए युद्ध भूमि में कूद पड़ते‌‍ थे ,। इतिहास में ऐसी घटनाओं का‌ उल्लेख “साका- जौहर” के नाम से किया ‌गया है।
आत्मबल एवं आत्मविश्वास से परिपूर्ण तथा युद्ध कला में भली भांति प्रशिक्षित वीरांगनाओं को भी युद्ध भूमि में इसलिए नहीं जाने दिया जाता था कि निकृष्ट आक्रमणकारी सैनिक वीरांगनाओं के शवों (मृत शरीरों ) के साथ भी अनैतिक आचरण (बलात्कार) करते थे किन्तु भारतीय वीरांगनाओं को यह कदापि स्वीकार्य नहीं था‌ की कोई नीच ‌विधर्मी उनके मृत शरीर को भी स्पर्श करे , फिर जीवित शरीर‌ का तो कहना ‌ही क्या..। हमारी पूर्वजा वीरांगनाएं चाकू ‌छुरी से या विषपान से भी अपनी जीवन- लीला समाप्त कर‌ सकती‌ थीं किन्तु उन्हें कतई‌ मंज़ूर नहीं था कि दुर्दांत हत्यारे उनके मरे हुए शरीर को‌ भी‌ अपने पापकर्मी‌ हाथों से स्पर्श करें।

उन्होंने मृत्यु को चुना, पर अपमान स्वीकार नहीं किया।
उन्होंने अग्नि को स्वीकार किया, पर पराधीनता की बेड़ियाँ स्वीकार नहीं कीं।
उनके लिए “जीवन का मूल्य केवल जीवन नहीं था—गरिमा के साथ जीवन” था।
जौहर की ज्वाला में केवल शरीर नहीं जले—उसमें भय जला, दासता जली और अपमान के सामने झुकने की मानसिकता जली।
यह हमारी वीरांगनाओं की उस अदम्य चेतना का प्रतीक है, जिसने आने वाली पीढ़ियों को सिखाया-“सम्मान से बड़ा कुछ नहीं, स्वाभिमान से ऊँचा कुछ नहीं!”
जो लोग जौहर को रेप सरवाइव से जोड़कर देखते हैं उन्हें पहले यह अच्छी तरह समझना चाहिए कि बलात्कार पीड़ित महिला भी सम्मान की अधिकारी है । उसके जीवन और सम्मान पर केवल उसका अधिकार है। बलात्कार पीड़ित महिला के जीवन और सम्मान की रक्षा का दायित्व समाज का है तथा अपराधी को दंडित करना न्याय व्यवस्था का धर्म है ।और यह भी भली- भांति समझना चाहिए कि उस कालखंड की वीरांगनाएं तो अपने मृत शरीर के बलात्कार की संभावनाओं को मिटाने के लिए ही स्वयं को अग्नि में भस्म कर लिया करती थीं। बलात्कार पीड़िता की पीड़ा को जौहर से जोड़ना‌‌ न तो ऐतिहासिक रूप से उचित है और न ही मानवीय रूप से।
जो लोग यह समझते हैं कि जौहर पर या हमारी श्रेष्ठ परंपराओं पर अनर्गल प्रलाप करके वे भारतीय संस्कृति के मूल्यों को क्षति पहुंचा‌ लेंगे तो ,उनका यह सोचना बेकार है। वे नहीं जानते कि भारतीय संस्कृति के महान संस्कार और उच्च नैतिक मूल्य सदियों से बहुत सुदृढ़ रहे हैं। ऐसे ढीले- ढाले नहीं कि‌ किसी की भी टिप्पणी से उन्हें आघात पहुंचेगा।

नादानों की टिप्पणियों से आघात उन्हें पहुंचता है जो लोग जौहर की गंभीरता को ,उसकी गरिमा को अच्छी तरह समझते हैं। इसलिए शीघ्र ही ऐसा कुछ किया जाना आवश्यक हो गया है जिससे भारत की महान परंपराओं के विरुद्ध कोई विषवमन करने के बारे में, अपशब्द बोलने के बारे में सोच भी नहीं सके। और उतना ही आवश्यक यह भी है‌ कि‌ जौहर एवं इसके जैसी गौरवशाली‌ भारतीय परंपराओं का विवरण पाठशालाओं में पाठ्यक्रम का हिस्सा बने । आतताई‌ मुगल आक्रमणकारियों के नाम भी पाठ्य पुस्तकों से बाहर कर दिए जाएं तथा उनके स्थान पर भारत के प्रतापी वीर- वीरांगनाओं के चरित्र पाठ्यक्रम में सम्मिलित कर अनिवार्य रूप से पढ़ाए जाएं।

जौहर को सती प्रथा का समानार्थी भी नहीं समझना चाहिए । सती होना एक व्यक्तिगत निर्णय हुआ करता था , जिसकी परिस्थितियां
भी भिन्न हुआ करती थीं। आज उसकी चर्चा की आवश्यकता नहीं है।
भारतीय इतिहास में ‌ जौहर की दीर्घ परंपरा की जानकारी प्राप्त होती है । ऐसे बहुत जौहर हुए जिनका इतिहास में केवल नामोल्लेख मिलता है ,किंतु जिन बड़े जौहर घटनाक्रमों का विवरण प्राप्त होता है, उनमें से कुछ इस प्रकार है–

(1) चित्तौड़ का प्रथम जौहर-सन्1303 ! अलाउद्दीन खिलजी की सेना के आक्रमण के सामने चित्तौड़ ने प्रतिरोध किया ।राजस्थान की ऐतिहासिक परंपरा इसे प्रथम साका और रानी पद्मिनी के जौहर के नाम से स्मरण ‌करती है , जिसमें रानी पद्मिनी ने आत्मसम्मान की रक्षा के लिए लगभग 10000 वीरांगनाओं के साथ अग्नि की ज्वाला में प्रवेश कर अपने प्राणों की आहुति दे दी थी।

(2) रणथंभोर का जौहर – सन् 1301 ! चित्तौड़ के‌ जौहर से पहले हम्मीर देव चौहान ने समर्पण के स्थान पर संघर्ष का मार्ग चुना। दुर्ग के पतन की घड़ी में वहां जौहर की परंपरा का स्पष्ट उल्लेख मिलता है। हम्मीर देव के मंत्री ने जौहर की व्यवस्था की। बलिदान करने वाली वीरांगनाओं की निश्चित संख्या की जानकारी नहीं है।‌ रणथंभौर जौहर का वर्णन अलाउद्दीन के दरबारी कवि अमीर खुसरो ने किया ,जो इसे फारसी भाषा के पाठ में वर्णित पहला जौहर कहता है।

(3) जैसलमेर का प्रथम जौहर-सन् 1294 -95 में जैसलमेर दुर्ग की घेराबंदी को भी इसी प्रचलित सूची में जोड़ा जाता है , जिसमें ‌बलिदान देने वाली राजपूत भाटी वीरांगनाओं की अनुमानित संख्या 24000 बताई जाती है।

(4) जालौर का जौहर -सन् 1311 ! इसमें 1584 जौहर- अग्नियों का उल्लेख मिलता है जिनमें इतिहास प्रसिद्ध रानी जैतल दे के साथ वीरांगनाओं ने ‌अग्नि स्नान किया।

(5) कंपिली का जौहर-सन् 1327 ! उत्तरी कर्नाटक के तुंगभद्रा क्षेत्र के कंपिली राज्य की वीरांगनाओं ने 1327 में मोहम्मद बिन तुगलक के आक्रमण के समय जौहर किया।

(6) जैसलमेर का द्वितीय जौहर‌ -14वीं-15वीं शताब्दी में जैसलमेर की लगभग 16000 भाटी, राजपूत वीरांगनाओं ने अपना पवित्र शरीर पवित्र अग्नि को समर्पित किया ।, वीरांगनाओं की निश्चित संख्या की जानकारी नहीं है।

(7) सिंध का जौहर -सन् 712 ! सरफिरे लुटेरे मोहम्मद बिन तुगलक ने भारत के पश्चिमी भागों में लूटपाट के इरादे से हमला किया ।उसने सिंध के हिंदू राजा दाहिर की राजधानी की घेराबंदी की ।दाहिर के वीरगति प्राप्त करने के बाद रानी ने कई महीनो तक राजधानी की रक्षा की परंतु जैसे ही भोजन की आपूर्ति समाप्त हुई राजधानी की महिलाओं के साथ रानी ने आत्म समर्पण करने से इनकार किया। चिताएं जलाकर अग्नि स्नान किया। पुरुष सैनिक युद्ध में मारने- मरने के लिए निकल पड़े।

(8) फिर चित्तौड़ ! सन् 1535 !! खानवा युद्ध (1528 ) के बाद राणा सांगा का स्वर्गवास हुआ‌ तो मेवाड़ और चित्तौड़ उनकी‌ विधवा रानी कर्णावती के शासन में ‌आए। गुजरात के सुल्तान बहादुर शाह ने मार्च 1535 में आक्रमण कर चित्तौड़ को घेर लिया। उस‌ समय दूसरा साका-जौहर हुआ ।रानी कर्णावती का नाम इस प्रसंग की लोक स्मृति में विशेष रूप से जुड़ा हुआ है ।उन्होंने लगभग 8000 नारियों के साथ ‌ स्वयं को अग्नि में भस्म कर लिया था। कुछ अन्य स्रोतों में जौहर करने वाली वीरांगनाओं की संख्या 13000 बताई जाती है।

(9) तीसरी बार चित्तौड़‌ !सन् 1568 !!‌ अकबर की सेना द्वारा 1567 में घेराव के बाद चित्तौड़ फिर रक्तरंजित हुआ।‌ महीनों तक युद्ध चला ।1568 में जयमल और पत्ता के नेतृत्व में पुरुषों के अंतिम युद्ध और‌ रानी फूल कुंवर ‌मेड़तणी के नेतृत्व में लगभग 700 स्त्रियों के जौहर की स्मृति इस दुर्ग की पहचान का हिस्सा बन‌‌ गई। परंपरागत मान्यता के अनुसार बलिदानी वीरांगनाओं की संख्या 7000 और कहीं-कहीं 8000 भी बताई जाती है।अबू- फ़ज़ल -इब्न मुबारक ने जौहर की इस घटना के पल-पल का विवरण लिखा। किले से बाहर आने वाले राजपूत सैनिकों की हत्या के बाद अपनी सेना के साथ अकबर ने धन वैभव और महिलाओं को लूटने के घृणित इरादे से चित्तौड़ किले में प्रवेश किया । डेविड स्मिथ के अनुसार- “1568 में अपनी सेना के साथ अकबर ने चित्तौड़ किले में प्रवेश किया तो वहां एक विशाल श्मशान के अतिरिक्त कुछ भी नहीं था।”
राजस्थान सरकार की पर्यटन मंत्रालय की गाइड में भी यहां के जौहर वर्णित हैं।
चित्तौड़ के जौहर ज्योति मंदिर में बलिदानी महारानी पद्मिनी , रानी कर्णावती और रानी फूल कुंवर मेड़ताणी की प्रतिमाएं स्थापित हैं।

(10) चंदेरी का जौहर -सन् 1528-29 ! राजपूत राजा मेदिनी राय ने 16वीं शताब्दी में मध्य भारत के चंदेरी में अपने शासनकाल के दौरान राजपूत राजा मेदिनी राय ने मुगल आक्रमणकारी बाबर की मुस्लिम सेनाओं के विरुद्ध खानवा की लड़ाई में राणा सांगा की सहायता करने का प्रयास किया तो जनवरी 1528 में बाबर की सेना ने चंदेरी के किले की घेराबंदी की।उस समय चंदेरी के किले में विद्यमान महिलाओं और बच्चों ने जौहर किया तथा पुरुषों ने भगवा वस्त्र पहनकर साका किया। बलिदानी वीरांगनाओं की निश्चित संख्या अज्ञात है। बाबरनामा में वर्णित इस जौहर का उल्लेख आधुनिक इतिहास परंपरा में भी मिलता है ।

(11) बुंदेलखंड का जौहर-सन् 1634 ! यह घटना 1634 में जुझार सिंह बुंदेला और मुगल शाहजहां के संघर्ष से जुड़ी है।आधुनिक अध्ययन इसे आततायी औरंगजेब से भी जोड़कर वर्णित करता है । सन 1635 में अत्याचारी औरंगजेब ने सेना की‌ ‌3 बटालियनों के साथ मध्य भारत के बुंदेलखंड‌ की घेराबंदी की , तो किले की महिलाओं ने जौहर के अग्नि -कुंड में स्वयं को भस्म कर लिया।जौहर करने वाली वीरांगनाओं की निश्चित संख्या अज्ञात है।

आत्म बलिदान की इन घटनाओं को‌ केवल मृत्यु की कहानी समझना इतिहास की आत्मा को अधूरा पढ़ना होगा। इनमें उस युग‌‌ के भयावह युद्धों की परिस्थितियां , अस्मिता की चिंता और प्रतिरोध की मानसिकता तीनों दिखाई देते हैं। जौहर की ज्वाला आज आत्मदाह का संदेश नहीं देती ।वह हमें यह प्रश्न देती है कि‌‌ क्या ऐसा समाज बनाया जा सकता है जहां किसी स्त्री को अपने सम्मान की रक्षा के लिए मृत्यु का विकल्प चुनना ही न पड़े ? उन पूज्या वीरांगनाओं को नमन करते हुए संकल्प लें- उनकी अग्नि को हम जीवन की शक्ति बनाएंगे ,उनके स्वाभिमान को नारी सम्मान ‌बनाएंगे और उनकी स्मृति को न्याय, साहस और गरिमा की मशाल बनाएंगे ।

आज जौहर को आत्मविनाश के रूप में नहीं, उस युग की असाधारण परिस्थितियों में स्त्री के स्वाभिमान और प्रतिरोध की चरम ऐतिहासिक अभिव्यक्ति के रूप में समझना चाहिए । वीरांगनाओं को शत-शत नमन जिनकी अग्नि ज्वाला इतिहास के पन्नों में नहीं, भारतीय अस्मिता की चेतना में आज भी प्रज्वलित है!

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