विशेष लेख:-कक्षा का दर्पण: शिक्षक और छात्र की परस्पर दृष्टि: डॉ. श्वेता चौबे

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कक्षा का दर्पण: शिक्षक और छात्र की परस्पर दृष्टि

— डॉ. श्वेता चौबे

प्राध्यापक एवं विभागाध्यक्ष,

बेसिक साइंसेस एंड ह्यूमैनिटीज, छत्तीसगढ़ प्रद्योगिकी संस्थान,

राज्य शासकीय संस्थान,

रायपुर छत्तीसगढ़


सच कहूं तो, शिक्षा मेरे लिए केवल पाठ्यक्रम पूरा करने या परीक्षा की तैयारी कराने का माध्यम नहीं, अपितु मेरा मानना है कि शिक्षा का वास्तविक उद्देश्य ऐसे विद्यार्थियों का निर्माण करना है जो जिज्ञासु हों, संवेदनशील हों, आत्मनिर्भर हों और समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारियों को समझते हों। इस पूरी प्रक्रिया का सबसे महत्वपूर्ण आधार शिक्षक ही होता है। इसलिए मैं हमेशा मानती हूं कि एक शिक्षक को केवल शिक्षक की दृष्टि से नहीं, बल्कि समय-समय पर विद्यार्थी की दृष्टि से भी सोचना चाहिए।

जब हम स्वयं को छात्र के स्थान पर रखकर किसी विषय को समझने का प्रयास करते हैं, तब हमें यह महसूस होता है कि उसे किन बिंदुओं पर कठिनाई आ सकती है, कौन-सी अवधारणा उसे स्पष्ट नहीं हो रही है और वह किस प्रकार बेहतर ढंग से सीख सकता है। यही दृष्टिकोण शिक्षण को अधिक प्रभावी, सहज और विद्यार्थी-केंद्रित बनाता है।

मेरा मानना यह है कि, माता-पिता के बाद यदि किसी का सबसे अधिक प्रभाव किसी बच्चे के व्यक्तित्व पर पड़ता है तो वह उसका शिक्षक होता है। बच्चे केवल हमसे पढ़ाई ही नहीं, बल्कि हमारे व्यवहार, भाषा, अनुशासन और जीवन मूल्यों को भी सीखते हैं। इसलिए शिक्षक का हर शब्द और हर व्यवहार विद्यार्थियों के लिए एक संदेश होता है। हमें हमेशा यह याद रखना चाहिए कि हम केवल पढ़ा नहीं रहे होते, बल्कि अगली पीढ़ी का निर्माण भी कर रहे होते हैं।

प्रभावी शिक्षण हेतु जितना आवश्यक विषय का गहरा ज्ञान होना है, उतना ही आवश्यक है कि हम विषय को किस प्रकार प्रस्तुत करते हैं। आज तकनीक ने शिक्षा को नई दिशा दी है, लेकिन मेरा विश्वास है कि सुव्यवस्थित ब्लैकबोर्ड शिक्षण आज भी उतना ही प्रभावी है। यदि शिक्षक पूर्व तैयारी के साथ कक्षा में जाए, लेसन प्लान बनाकर पढ़ाए और व्यवस्थित ढंग से विषय प्रस्तुत करे, तो विद्यार्थी विषय को अधिक आसानी से समझ पाते हैं।

मुझे हमेशा लगता है कि कक्षा का वातावरण भयमुक्त होना चाहिए। विद्यार्थी यदि प्रश्न पूछने में संकोच करेंगे तो सीखने की प्रक्रिया अधूरी रह जाएगी। हमें उन्हें रटा-रटाया उत्तर देने के बजाय सोचने, तर्क करने और स्वयं समाधान खोजने के लिए प्रेरित करना चाहिए। शिक्षा का उद्देश्य केवल सही उत्तर तक पहुंचना नहीं, बल्कि सही तरीके से सोचने की क्षमता विकसित करना भी है।

मैं गतिविधि आधारित शिक्षण को बहुत महत्वपूर्ण मानती हूं। जब विद्यार्थी स्वयं चार्ट बनाते हैं, मॉडल तैयार करते हैं, समूह चर्चा करते हैं या अपने साथियों को किसी विषय को समझाते हैं, तब उनका आत्मविश्वास बढ़ता है और सीखना अधिक स्थायी बनता है। मेरा अनुभव है कि जब विद्यार्थी स्वयं सीखने की प्रक्रिया का सक्रिय हिस्सा बनते हैं, तभी शिक्षा वास्तव में जीवंत होती है।

आज की शिक्षा को रोजगार और जीवन कौशल से जोड़ना भी समय की आवश्यकता है। मेरा प्रयास हमेशा यही रहता है कि कोई भी विद्यार्थी केवल डिग्री लेकर न निकले, बल्कि उसके पास ऐसा ज्ञान, कौशल और आत्मविश्वास हो जो उसे आत्मनिर्भर बना सके। चाहे पारंपरिक हुनर हो या आधुनिक तकनीकी दक्षता, शिक्षा का अंतिम उद्देश्य व्यक्ति को सम्मानपूर्वक जीवन जीने योग्य बनाना होना चाहिए।

मैं यह भी मानती हूं कि हर विद्यार्थी की परिस्थितियां अलग होती है। कई बार पढ़ाई में कमजोर दिखाई देने वाला विद्यार्थी किसी मानसिक तनाव, पारिवारिक समस्या या सामाजिक परिस्थिति से जूझ रहा होता है। इसलिए शिक्षक को केवल अंक नहीं देखने चाहिए, बल्कि विद्यार्थी को समझने का प्रयास भी करना चाहिए। नियमित संवाद और संवेदनशील काउंसलिंग से अनेक समस्याओं का समाधान संभव है। कई बार शिक्षक अपने विद्यार्थियों द्वारा साझा की गई व्यक्तिगत बातों की गोपनीयता बनाए रखना शिक्षक का नैतिक दायित्व है। विश्वास ही शिक्षक और विद्यार्थी के संबंध की सबसे मजबूत नींव है।

एक शिक्षक के रूप में मैं स्वयं भी निरंतर सीखने में विश्वास रखती हूं। शिक्षा लगातार बदल रही है और यदि शिक्षक स्वयं को समय के साथ अद्यतन नहीं रखेगा, तो वह विद्यार्थियों को भविष्य के लिए तैयार नहीं कर पाएगा। नई तकनीकों, नवाचारों और आधुनिक शिक्षण पद्धतियों को अपनाना आज हमारी आवश्यकता है, विकल्प नहीं।

अंततः मेरा विश्वास है कि विद्यालय केवल पढ़ाई का स्थान नहीं होना चाहिए। वहाँ ऐसा शैक्षणिक वातावरण बने, जहां विद्यार्थी सीखें, सोचें, प्रश्न करें, संवाद करें, अपने व्यक्तित्व का विकास करें और एक बेहतर इंसान बनने की दिशा में आगे बढ़ें। यदि प्रत्येक शिक्षक अपने दायित्व को केवल नौकरी नहीं, बल्कि राष्ट्र निर्माण के मिशन के रूप में स्वीकार कर ले, तो शिक्षा व्यवस्था में सकारात्मक परिवर्तन निश्चित रूप से दिखाई देगा।

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