
बांके बिहारी
नैनन के द्वारा सौं मन में उतरे,
हिय में आय विराजे हैं जब सौं ।
स्वर्णिम आभा सों दमकैं दिन रैना,
मधुमय प्राण और देह हैं तब सौं।
मन की महिमा का बखान हो कैसै,
मन मंदिर सम हुआ अति पावन।
जगमग सी जोत रहे सुखकारी,
दृश्य अलौकिक ‘उर्मि’ मनभावन।
मुरली की तान मधुर सुनी जब तैं,
सुध बुध बिसरी मन हरषै तब सौं।
मोर मुकुट युत छबि मन मोहै,
सांवरे रूप की शोभा अनुपम।
बांके बिहारी की बांकी छबि पै,
तन मन के सब भाव हैं अर्पण।
जित देखूं, उत श्याम दिखत हैं,
मन हुआ दर्पण ,नैना भी दर्पण।
लेखिका
उर्मिला देवी उर्मी
मंच संचालिका
रायपुर ,छत्तीसगढ़



















