महिला आयोग अदालत की तरह बाध्यकारी आदेश जारी नहीं कर सकता: हाईकोर्ट

0
4

GAIL के खिलाफ राज्य महिला आयोग के तीन आदेश रद्द, कोर्ट ने कहा- आयोग की भूमिका जांच और सिफारिश तक सीमित


बिलासपुर छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने राज्य महिला आयोग के अधिकार क्षेत्र को लेकर अहम फैसला सुनाया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि महिला आयोग अदालत की तरह किसी पक्ष के अधिकार, दायित्व या जवाबदेही तय करने वाला बाध्यकारी न्यायिक आदेश जारी नहीं कर सकता। आयोग की भूमिका मुख्य रूप से जांच, सुझाव और सिफारिश तक सीमित है।

जस्टिस अमितेंद्र किशोर प्रसाद की सिंगल बेंच ने गैस अथॉरिटी ऑफ इंडिया लिमिटेड (GAIL) की रिट याचिका स्वीकार करते हुए राज्य महिला आयोग द्वारा जारी 19 जून 2025, 6 जुलाई 2026 और 8 जुलाई 2026 के तीन आदेशों को रद्द कर दिया। कोर्ट ने इन आदेशों को आयोग के अधिकार क्षेत्र से बाहर माना।

पाइपलाइन निर्माण रोकने और मुआवजा बढ़ाने का दिया था निर्देश

मामला गैस पाइपलाइन बिछाने के लिए भूमि में उपयोग के अधिकार से जुड़ा था। GAIL की ओर से अधिवक्ता संदीप दुबे ने दलील दी कि संबंधित कानून के तहत निर्धारित प्रक्रिया का पालन किया जा रहा था और सक्षम प्राधिकारी भूमि के मुआवजे की राशि भी तय कर चुका था।

इसके बावजूद महिला आयोग ने कथित तौर पर मुआवजा बढ़ाने और क्षतिपूर्ति देने का निर्देश दिया। साथ ही GAIL अधिकारियों के खिलाफ FIR की चेतावनी और पाइपलाइन निर्माण पर रोक लगाने का आदेश भी जारी किया गया था। GAIL ने तर्क दिया कि आयोग के पास इस तरह के बाध्यकारी और न्यायिक प्रकृति के आदेश जारी करने की वैधानिक शक्ति नहीं है।

सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का भी दिया संदर्भ

सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के भवानी प्रसाद जेना बनाम ओडिशा राज्य महिला आयोग सहित मुंबई पोर्ट अथॉरिटी से जुड़े हालिया फैसले का भी संदर्भ लिया। कोर्ट ने कहा कि आयोग को दस्तावेज तलब करने और गवाही लेने जैसी शक्तियां तथ्यों की जांच-पड़ताल के लिए दी गई हैं।

हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि इन शक्तियों के आधार पर आयोग न्यायालय की भूमिका ग्रहण कर किसी विवाद का अंतिम और बाध्यकारी फैसला नहीं सुना सकता। महिलाओं के अधिकारों की रक्षा के लिए आयोग सिफारिशी कदम उठा सकता है, लेकिन किसी विवाद का न्यायिक निपटारा करना उसके अधिकार क्षेत्र में नहीं है।

कोर्ट ने पाया कि इस मामले में आयोग ने अपनी वैधानिक सीमा से आगे बढ़कर सक्षम प्राधिकारियों के अधिकार क्षेत्र में हस्तक्षेप किया। इसी आधार पर तीनों विवादित आदेशों को कानूनी रूप से टिकाऊ नहीं मानते हुए रद्द कर दिया गया और GAIL की याचिका स्वीकार कर ली गई।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here