जज़्बात-ए-ग़ज़ल: वो दिल दुखा के मेरा ये उमीद रखता है- ग़ज़लकार(मुकेश कुमार सिंह ‘मुसाफ़िर’)

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वो दिल दुखा के मेरा ये उमीद रखता है


ज़रूरतों के मुताबिक मैं कुछ तो चाहूँगा
वगरना कैसे कोई राब्ता निभाऊँगा

वो दिल दुखा के मेरा ये उमीद रखता है
लिहाज़ करते हुए उसका मुस्कुराऊँगा

जो मसअला है कहो मत यूँ जल्दबाज़ी में
मैं वक़्त आने पे ही फ़ैसला सुनाऊँगा

अभी ग़ुरूर है दिल में दिमाग़ में है अना
किसी के सामने कैसे मैं सर झुकाऊँगा

मैं अपने शोर में दिल की सदा न सुन पाया
न जाने ख़ुद से मैं कैसे नज़र मिलाऊँगा


मुकेश कुमार सिंह


लेखक परिचय:


मुकेश कुमार सिंह ‘मुसाफ़िर’
सीनियर सेक्शन इंजीनियर (माल व सवारी डब्बा ), नागपुर /मध्य रेल
मूल निवासी :- ग्राम-सुरडुंग, भिलाई, छत्तीसगढ़
ग़ज़ल संग्रह -1) क्या पता क्या है
2) ज़लील होने तक

 


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