जज़्बात-ए-ग़ज़ल: वो दिल दुखा के मेरा ये उमीद रखता है- ग़ज़लकार(मुकेश कुमार सिंह ‘मुसाफ़िर’)

0
143

वो दिल दुखा के मेरा ये उमीद रखता है


ज़रूरतों के मुताबिक मैं कुछ तो चाहूँगा
वगरना कैसे कोई राब्ता निभाऊँगा

वो दिल दुखा के मेरा ये उमीद रखता है
लिहाज़ करते हुए उसका मुस्कुराऊँगा

जो मसअला है कहो मत यूँ जल्दबाज़ी में
मैं वक़्त आने पे ही फ़ैसला सुनाऊँगा

अभी ग़ुरूर है दिल में दिमाग़ में है अना
किसी के सामने कैसे मैं सर झुकाऊँगा

मैं अपने शोर में दिल की सदा न सुन पाया
न जाने ख़ुद से मैं कैसे नज़र मिलाऊँगा


मुकेश कुमार सिंह


लेखक परिचय:


मुकेश कुमार सिंह ‘मुसाफ़िर’
सीनियर सेक्शन इंजीनियर (माल व सवारी डब्बा ), नागपुर /मध्य रेल
मूल निवासी :- ग्राम-सुरडुंग, भिलाई, छत्तीसगढ़
ग़ज़ल संग्रह -1) क्या पता क्या है
2) ज़लील होने तक

 


यह भी पढ़ें:

जज़्बात-ए-ग़ज़ल: अगर है दोस्ती कीचड़ उछाल सकता है- ग़ज़लकार(मुकेश कुमार सिंह ‘मुसाफ़िर’)

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here