
रायपुर छत्तीसगढ़ विधानसभा के मानसून सत्र में पेश अपराध संबंधी आंकड़ों ने राज्य की कानून-व्यवस्था को लेकर कई अहम सवाल खड़े कर दिए हैं। उप मुख्यमंत्री एवं गृह मंत्री विजय शर्मा द्वारा साझा किए गए जिलेवार आंकड़ों के अनुसार, अपराध अब केवल बड़े शहरों तक सीमित नहीं है, बल्कि आदिवासी और ग्रामीण क्षेत्रों में भी हिंसक घटनाओं में तेजी दर्ज की गई है। रिपोर्ट से संकेत मिलता है कि बदलते अपराध स्वरूप के अनुरूप पुलिस व्यवस्था को भी नई रणनीति अपनाने की जरूरत है।
बिलासपुर में हर सातवें दिन हत्या
न्यायधानी बिलासपुर पिछले दो वर्षों में हत्या के मामलों को लेकर सबसे संवेदनशील जिलों में शामिल रहा। इस अवधि में जिले में 109 हत्या के मामले दर्ज हुए, यानी औसतन हर सप्ताह एक हत्या हुई। वहीं 65 लूट और राहजनी की घटनाएं भी दर्ज की गईं। विशेषज्ञों के अनुसार, शहर का तेजी से विस्तार, बाहरी क्षेत्रों में कमजोर निगरानी और बढ़ते भूमि विवाद अपराध बढ़ने की प्रमुख वजह हैं।
जशपुर बना सबसे हिंसक जिला
रिपोर्ट में सबसे चौंकाने वाले आंकड़े जशपुर जिले से सामने आए हैं। पिछले दो वर्षों में यहां 114 हत्या के मामले दर्ज हुए, जो प्रदेश में सबसे अधिक हैं। शांत और जनजातीय क्षेत्र के रूप में पहचाने जाने वाले जशपुर में पारिवारिक विवाद, आपसी रंजिश और सामाजिक कारणों से हिंसक घटनाओं में लगातार बढ़ोतरी दर्ज की गई है।
दुर्ग में हत्या बढ़ी, लूट के मामलों में कमी
दुर्ग जिले में दो वर्षों के दौरान 113 हत्या के मामले दर्ज किए गए। हालांकि, राहत की बात यह रही कि पुलिस की कार्रवाई के चलते लूट और डकैती की घटनाओं में कमी आई। लूट के मामले 43 से घटकर 27 रह गए।
बलौदाबाजार में हाईवे पर बढ़ीं लूट की वारदातें
बलौदाबाजार जिले में 67 हत्या के मामले सामने आए, लेकिन सबसे अधिक चिंता हाईवे पर बढ़ती लूटपाट को लेकर जताई गई। यहां लूट की घटनाएं 15 से बढ़कर 35 हो गईं। रिपोर्ट के अनुसार, औद्योगिक वाहनों की आवाजाही और सुनसान मार्गों का फायदा उठाकर अपराधी सक्रिय हैं।
कस्टडी में मौतों ने बढ़ाई चिंता
विधानसभा में पेश आंकड़ों के मुताबिक, बीते दो वर्षों में धमतरी, कोरबा, बलरामपुर और बीजापुर जिलों में पुलिस हिरासत के दौरान चार लोगों की मौत हुई। इन घटनाओं ने पुलिस कार्यप्रणाली, हिरासत प्रबंधन और मानवाधिकारों को लेकर गंभीर सवाल खड़े किए हैं।
नक्सल प्रभावित जिले अपेक्षाकृत सुरक्षित
रिपोर्ट का एक सकारात्मक पहलू यह भी रहा कि नक्सल प्रभावित कुछ जिले गंभीर अपराधों के मामले में अपेक्षाकृत सुरक्षित रहे। नारायणपुर जिले में दो वर्षों के दौरान हत्या और लूट सहित गंभीर अपराधों के कुल 43 मामले दर्ज किए गए। इससे संकेत मिलता है कि जहां शहरी क्षेत्रों में संगठित और संपत्ति संबंधी अपराध बढ़ रहे हैं, वहीं ग्रामीण इलाकों में सामाजिक और पारिवारिक विवाद हिंसा की बड़ी वजह बने हुए हैं।
नई चुनौतियों के लिए नई पुलिसिंग की जरूरत
विधानसभा में पेश आंकड़ों से स्पष्ट है कि प्रदेश में अपराध का स्वरूप तेजी से बदल रहा है। ऐसे में केवल पारंपरिक पुलिसिंग से काम नहीं चलेगा। विशेषज्ञों का मानना है कि बदलती परिस्थितियों के अनुरूप खुफिया तंत्र, सामुदायिक पुलिसिंग और तकनीक आधारित निगरानी व्यवस्था को और अधिक मजबूत करने की आवश्यकता है।



















