
रायपुर छत्तीसगढ़ की पहचान और पंडवानी कला को वैश्विक मंच तक पहुंचाने वाली पद्म विभूषण डॉ. तीजन बाई का 70 वर्ष की उम्र में निधन हो गया। लंबे समय से अस्वस्थ चल रहीं तीजन बाई ने रायपुर के एम्स अस्पताल में अंतिम सांस ली। उनके निधन से छत्तीसगढ़ ही नहीं, बल्कि पूरे देश के कला और सांस्कृतिक जगत में शोक की लहर है।
गांव से दुनिया तक का सफर
दुर्ग जिले के गनियारी गांव में जन्मीं तीजन बाई ने बेहद साधारण परिवेश से निकलकर असाधारण पहचान बनाई। उन्होंने पंडवानी—महाभारत की कथाओं पर आधारित छत्तीसगढ़ की पारंपरिक लोककला—को देश-विदेश में नई पहचान दिलाई। उनकी दमदार आवाज, जीवंत अभिनय और अनूठी प्रस्तुति शैली ने दर्शकों को हमेशा मंत्रमुग्ध किया।
पुरुष प्रधान परंपरा को दी चुनौती
तीजन बाई ने उस दौर में पंडवानी मंच पर अपनी पहचान बनाई जब यह कला लगभग पूरी तरह पुरुष कलाकारों के वर्चस्व में थी। उन्होंने पारंपरिक सीमाओं को तोड़ते हुए कपालिक शैली में खड़े होकर प्रस्तुति दी और इस कला को नई ऊर्जा प्रदान की। उनकी यह यात्रा संघर्ष, साहस और समर्पण की मिसाल रही।
सम्मानों से सजा शानदार सफर
भारतीय लोककला में अतुलनीय योगदान के लिए तीजन बाई को अनेक राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय सम्मानों से नवाजा गया। उन्हें पद्मश्री, पद्म भूषण, और देश के दूसरे सर्वोच्च नागरिक सम्मान पद्म विभूषण से सम्मानित किया गया। इसके अलावा उन्हें संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार सहित कई प्रतिष्ठित पुरस्कार प्राप्त हुए।
प्रधानमंत्री ने जताया शोक
प्रधानमंत्री Narendra Modi ने तीजन बाई के निधन पर गहरा शोक व्यक्त करते हुए इसे कला और संस्कृति जगत की अपूरणीय क्षति बताया। उन्होंने कहा कि तीजन बाई ने अपनी अद्भुत प्रस्तुतियों से छत्तीसगढ़ की लोककला को वैश्विक पहचान दिलाई।
एक युग का अंत
तीजन बाई का जाना केवल एक कलाकार का निधन नहीं, बल्कि भारतीय लोक परंपरा के एक स्वर्णिम अध्याय का अंत है। उनकी आवाज, उनकी शैली और उनकी कला आने वाली पीढ़ियों के लिए हमेशा प्रेरणा बनी रहेगी।


















