
शिक्षक दिवस विशेष लेख: शिक्षक के हाथों में निर्माण और विनाश दोनों खेलते हैं:- उर्मिला देवी उर्मि
रायपुर– मनुष्य के जीवन में शिक्षक का स्थान केवल ज्ञान देने वाले व्यक्ति का नहीं है। शिक्षक वह शिल्पकार है, जिसके हाथों में राष्ट्र का भविष्य आकार लेता है। वह एक ऐसी ज्योति है जो स्वयं प्रकाशित होकर असंख्य जीवनों को प्रकाश देती है। उसके शब्दों में दिशा देने की शक्ति होती है, उसके संस्कारों में व्यक्तित्व गढ़ने की क्षमता होती है और उसके मार्गदर्शन में समाज की भावी पीढ़ी का चरित्र निर्मित होता है।
इसीलिए कहा जा सकता है—
“शिक्षक के हाथों में निर्माण और विनाश दोनों खेलते हैं।”
यहाँ निर्माण का अर्थ विद्यार्थी की प्रतिभा, आत्मविश्वास, विवेक और व्यक्तित्व को सही अर्थों में विकसित करना है। सच्चे शिक्षक इनका निर्माण और संवर्धन करते हैं।
शिक्षक के हाथों से विनष्ट होता है—अज्ञान का अंधकार, दुर्बलताओं की जकड़न, भय, आलस्य, कुसंस्कार, अविवेक और जीवन की वे बुराइयाँ जो मनुष्य की प्रगति में बाधक बनती हैं।
अतः शिक्षक द्वारा “विनाश” विद्यार्थी की दुर्बलताओं और अवांछित प्रवृत्तियों का विनाश है ,
यही शिक्षक की वास्तविक शक्ति है।
गुरु द्वारा सामर्थ्य का जागरण
भारतीय इतिहास में इस दृष्टि से सुदीर्घ गुरु-शिष्य परंपरा रही है। चाणक्य और चद्रगुप्त इस परंपरा के महत्वपूर्ण उदाहरण के रूप में सामने हैं। चाणक्य ने चंद्रगुप्त में केवल एक बालक नहीं देखा; एक राष्ट्र नायक के रूप में उसकी संभावनाओं को पहचानकर उसे शिक्षित और प्रशिक्षित किया ।
यही सच्चे शिक्षक की दृष्टि है।
जहाँ सामान्य दृष्टि वर्तमान को देखती है, वहाँ गुरु भविष्य की संभावना को देखते हैं।
चाणक्य ने चंद्रगुप्त की क्षमताओं को शिक्षा, प्रशिक्षण और अनुशासन के माध्यम से दिशा दी। एक व्यक्ति की क्षमता को व्यापक राजनीतिक और राष्ट्रीय उद्देश्य से जोड़ना गुरु की दूरदृष्टि का परिचायक है।
शिक्षा का दीप : अज्ञान का विनाश
शिक्षा का प्रथम कार्य अज्ञान के अंधकार को दूर करना है।
अज्ञान केवल यह न जानना नहीं है कि किसी पुस्तक में क्या लिखा है। अज्ञान का व्यापक अर्थ है—सत्य और असत्य में अंतर न कर पाना, उचित-अनुचित का विवेक न होना और जीवन के उद्देश्य को न समझ पाना।
विद्या केवल सूचना नहीं देती; वह विचार करने की ज्योति देती है।
शिक्षक विद्यार्थी के भीतर इसी ज्योति को प्रज्वलित करते हैं। वह उसे प्रश्न करना, तर्क करना, प्रमाण को समझना और सत्य की खोज करना सिखाते हैं।
इसलिए शिक्षक द्वारा जो सबसे बड़ा रचनात्मक विनाश किया जाता है—वह अज्ञान के अंधकार को नष्ट करके ज्ञान का प्रकाश निर्मित करना है।
विद्या : केवल ज्ञान नहीं, विवेक की शक्ति
शिक्षक का कार्य केवल विद्यार्थी को अधिक जानकारी देना नहीं है। उसे विवेकशील बनाना उससे भी बड़ा कार्य है।
आज सूचना का संसार अत्यंत विस्तृत हो गया है। मोबाइल, इंटरनेट और कृत्रिम बुद्धिमत्ता के माध्यम से विद्यार्थी कुछ ही क्षणों में असंख्य सूचनाएँ प्राप्त कर सकता है।लेकिन—सूचना और ज्ञान में अंतर है, और ज्ञान तथा विवेक में उससे भी बड़ा अंतर है।
आज शिक्षक विद्यार्थी को यह सिखाते हैं।
क्या स्वीकार करना है,
क्या अस्वीकार करना है,
किस पर विश्वास करना है,
किस पर प्रश्न करना है,
और प्राप्त ज्ञान का उपयोग किस उद्देश्य से करना है।
सूचना के जंगल में विवेक इसका मार्गदर्शक है।
विद्या से विनय : बुद्धि का परिष्कार
शिक्षा का उद्देश्य केवल बुद्धि को भरना नहीं, बल्कि उसे परिष्कृत करना भी है।
सुनने, ग्रहण करने, धारण करने, समझने, तर्क-वितर्क करने और तत्त्व को जानने के लिए तत्पर बुद्धि को विद्या विनम्र बनाती है।
ध्यान देने योग्य है कि वास्तविक शिक्षा अहंकार नहीं बढ़ाती; वह बुद्धि को विनय और अनुशासन प्रदान करती है।
यही शिक्षक की भूमिका है।
वह विद्यार्थी को केवल “मैं कितना जानता हूँ” की भावना से निकालकर “मैं और क्या सीख सकता हूँ” की विनम्रता तक पहुँचाते हैं।
सुनने से प्रज्ञा बुद्धि और प्रज्ञा से आत्मशक्ति
शिक्षक—
ज्ञान देते हैं → ज्ञान से प्रज्ञा आती है → प्रज्ञा से आत्मसंयम आता है → आत्मसंयम से सामर्थ्य विकसित होती है।
इसलिए सच्चे शिक्षक विद्यार्थी को अपने ऊपर निर्भर नहीं बनाते; वह उसे स्वयं अपने जीवन का मार्गदर्शक बनने योग्य बनाते हैं।
दुर्बलताओं का विनाश, सामर्थ्य का निर्माण
प्रत्येक विद्यार्थी में कुछ शक्तियाँ होती हैं और कुछ सीमाएँ भी।
कोई विद्यार्थी संकोची हो सकता है, कोई निर्णय लेने में कमजोर, कोई अनुशासन में कमजोर, कोई आलस्य से ग्रस्त और कोई असफलता के भय से पीछे हटने वाला।
सच्चे शिक्षक इन दुर्बलताओं को देखकर विद्यार्थी को निराश नहीं करते। वह उन्हें पहचानते है और धीरे-धीरे दूर करने का प्रयास करते हैं।
शिक्षक बताते हैं—
“तुम्हारी कमजोरी तुम्हारी अंतिम पहचान नहीं है।”
यहीं से शिक्षक की भूमिका प्रारंभ होती है।
वह आलस्य के स्थान पर कर्मठता, भय के स्थान पर साहस, भ्रम के स्थान पर विवेक और निराशा के स्थान पर आशा का निर्माण करते हैं।
चाणक्य के नीतिसूत्रों में भी शिक्षा और विनय का संबंध स्पष्ट किया गया है
“इन्द्रियजयस्य मूलं विनयः।”
अर्थात् इन्द्रियों पर विजय का मूल विनम्रता है।
इसका शिक्षा-संदर्भ अत्यंत महत्वपूर्ण है। विद्यार्थी की ऊर्जा को उच्च दबाना नहीं, बल्कि उ उसे अनुशासित करके सही दिशा देना ही शिक्षक का कार्य है।अतः—
दुर्बलता का विनाश = सामर्थ्य का निर्माण।
बुराइयों का विनाश ही सच्चा चरित्र-निर्माण है
शिक्षा का उद्देश्य केवल बुद्धि को तीक्ष्ण बनाना नहीं, बल्कि चरित्र को श्रेष्ठ बनाना भी है।
यदि ज्ञान बढ़े, किन्तु अहंकार भी बढ़े; बुद्धि विकसित हो, किन्तु विवेक न आए; सफलता मिले, किन्तु संवेदनशीलता समाप्त हो जाए—तो ऐसी शिक्षा अधूरी है।
चाणक्य के नीतिसूत्र में कहा गया है—
“गुणे न मत्सरः कर्तव्यः।”
अर्थात् दूसरे के गुण देखकर ईर्ष्या नहीं करनी चाहिए।और—
“शत्रोरपि सुगुणो ग्राह्यः।”
अर्थात् शत्रु में भी यदि कोई गुण हो तो उसे ग्रहण करना चाहिए।
यह शिक्षा के चरित्रात्मक पक्ष को अत्यंत सुंदर ढंग से सामने रखते हैं।
सच्चे शिक्षक विद्यार्थी के भीतर से ईर्ष्या, द्वेष, अहंकार, छल और अविवेक जैसी प्रवृत्तियों को कम करते हैं तथा गुणों के प्रति सम्मान उत्पन्न करते हैं।
इसलिए शिक्षक द्वारा विनाश बुराई का विनाश है और उसका परिणाम चरित्र का निर्माण है।
प्रतिभा का परिष्कार और सदुपयोग
यहाँ एक अत्यंत महत्वपूर्ण बात स्पष्ट करना आवश्यक है।
शिक्षक विद्यार्थी की प्रतिभा को तराशने वाले होते हैं।
जिस प्रकार कच्चे पत्थर में मूर्ति की संभावना छिपी रहती है, उसी प्रकार विद्यार्थी के भीतर प्रतिभा की संभावनाएँ छिपी रहती हैं।
शिल्पकार पत्थर को नष्ट नहीं करता; वह अनावश्यक अंश हटाकर उसके भीतर छिपे सौंदर्य को प्रकट करता है।
ठीक उसी प्रकार शिक्षक विद्यार्थी की प्रतिभा को दबाते नहीं, बल्कि उसकी सीमाओं और कमजोरियों को दूर करके उसे अधिक प्रभावी बनाते हैं।
अतः शिक्षक द्वारा “विनाश” वास्तव में— प्रतिभा को ढकने वाली दुर्बलताओं का विनाश है।
आत्मविश्वास का निर्माण
आत्मविश्वास भी शिक्षक के हाथों में बनने वाली महान शक्तियों में से एक है।
एक विद्यार्थी जब पहली बार मंच पर बोलता है, पहली कविता लिखता है, पहली बार किसी प्रतियोगिता में भाग लेता है , पहली कहानी लिखता है या असफल होकर पुनः प्रयास करता है—तब उसके पीछे किसी शिक्षक का प्रोत्साहन अक्सर दिखाई देता है।
शिक्षक का एक वाक्य—
“तुम कर सकते हो।”
किसी विद्यार्थी के जीवन में निर्णायक मोड़ ला सकता है।
इसी प्रकार शिक्षक विद्यार्थी को असफलता से डरने के बजाय उससे सीख लेना सिखाते है।
इस प्रकार शिक्षक आत्मविश्वास की जड़ों को मजबूत करते हैं।
अनुशासन : व्यक्ति को तोड़ना नहीं, उसे सक्षम बनाना
भारतीय परंपरा के संदर्भ में “दण्ड” अथवा कठोर अनुशासन की चर्चा करते समय उसके उद्देश्य को समझना आवश्यक है।
शिक्षा में अनुशासन का उद्देश्य विद्यार्थी को भयभीत करना नहीं होता। उसका उद्देश्य है—उसे अपने व्यवहार, इच्छाओं और कर्मों पर नियंत्रण रखना सिखाना।
शिक्षा में अनुशासन विद्यार्थी को आत्मनियंत्रण की ओर ले जाने वाला होना चाहिए।
बाहरी अनुशासन से श्रेष्ठ है आत्मानुशासन।
यहाँ शिक्षा का अंतिम लक्ष्य केवल व्यक्तिगत सफलता नहीं, बल्कि लोकहित दिखाई देता है।
शिक्षक : राष्ट्र-निर्माण की प्रथम प्रयोगशाला
एक शिक्षक के सामने बैठा विद्यार्थी केवल वर्तमान का विद्यार्थी नहीं है।वह भविष्य का—
वैज्ञानिक हो सकता है,
शिक्षक हो सकता है,
प्रशासक हो सकता है,
साहित्यकार हो सकता है,
कलाकार हो सकता है,
सैनिक हो सकता है,
उद्यमी हो सकता है,
या राष्ट्र का नेतृत्व करने वाला नागरिक हो सकता है।
इसलिए शिक्षक का प्रभाव कक्षा की चारदीवारी तक सीमित नहीं रहता।
एक शिक्षक एक विद्यार्थी को बदलता है; एक विद्यार्थी अनेक जीवनों को प्रभावित कर सकता है; और इस प्रकार शिक्षक अप्रत्यक्ष रूप से पूरे समाज को प्रभावित करता है।
प्रतिदिन बदलती हुई तकनीक के दौर में शिक्षक की भूमिका अधिक निर्णायक हो गई है।
आज सूचना का संसार अत्यंत विस्तृत हो गया है। इंटरनेट और कृत्रिम बुद्धिमत्ता के युग में विद्यार्थी को जानकारी प्राप्त करने के लिए पहले की तुलना में बहुत कम समय और श्रम की आवश्यकता होती है।
किन्तु—
जहाँ मशीन सूचना दे सकती है, वहाँ शिक्षक सूचना के अर्थ का बोध कराते हैं।
जहाँ तकनीक उत्तर दे सकती है, वहाँ शिक्षक सही प्रश्न करना सिखाते हैं।
जहाँ इंटरनेट विकल्पों की भीड़ देता है, वहाँ शिक्षक चयन का विवेक देते हैं।
और जहाँ कृत्रिम बुद्धिमत्ता सामग्री उत्पन्न कर सकती है, वहाँ शिक्षक विद्यार्थी को यह समझाते हैं कि सत्य, नैतिकता और मानवीय उत्तरदायित्व क्या हैं।
यही कारण है कि आज शिक्षक की भूमिका कम नहीं हुई है; बल्कि और अधिक गहरी हुई है।
शिक्षक—
अज्ञान का विनाश करते हैं और ज्ञान का निर्माण।
अविवेक का विनाश करते हैं और विवेक का निर्माण।
भय का विनाश करते हैं और साहस का निर्माण।
आलस्य का विनाश करते हैं और कर्मठता का निर्माण।
कुसंस्कारों का विनाश करते हैं और चरित्र का निर्माण।
दुर्बलताओं का विनाश करते हैं और सामर्थ्य का संवर्धन।
निराशा का विनाश करते हैं और आशा का निर्माण।
इसके साथ यह भी ध्यान रखना है कि शिक्षक तो
विद्यार्थी की प्रतिभा को
विद्यार्थी के आत्मविश्वास को
विद्यार्थी की मौलिकता को
विद्यार्थी के व्यक्तित्व को
परिष्कृत, विकसित और सशक्त करते हैं।
वास्तव में शिक्षक के हाथों में निर्माण और विनाश दोनों हैं—परंतु इन दोनों शब्दों का अर्थ समझना आवश्यक है।
आचार्य चाणक्य की शिक्षा-दृष्टि हमें बताती है कि विद्या केवल सूचना नहीं; वह विवेक का दीपक है।
“प्रदीपः सर्वविद्यानाम्।
अध्ययन से प्रज्ञा उत्पन्न होती है—
“श्रुताद्धि प्रज्ञोपजायते…”
और प्रज्ञा से आत्मसंयम तथा आत्मशक्ति विकसित होती है।
शिक्षक-अपने अनथक प्रयासों से प्रतिभा ,आत्मविश्वास और सच्चरित्रवान व्यक्तित्व का निर्माण करते है
विद्यार्थी की दुर्बलताओं को मिटाते हैं।
वह ज्ञान का निर्माण करते है और अज्ञान का विनाश।
वह चरित्र का निर्माण करते हैं और कुसंस्कारों का विनाश।
वह साहस का निर्माण करते हैं और भय का विनाश।
वह विवेक का निर्माण करते हैं और अविवेक का विनाश।
आचार्य चाणक्य और चंद्रगुप्त से जुड़ी गुरु-शिष्य परंपरा हमें यही महान संदेश देती है कि एक योग्य शिक्षक किसी एक विद्यार्थी का ही नहीं, पूरे युग का निर्माण कर सकता है।
इसलिए शिक्षक के हाथों में केवल चॉक और पुस्तक नहीं होती; उनके हाथों में भविष्य की दिशा होती है।
वह अंधकार के संहारक और प्रकाश के निर्माता हैं।
वह दुर्बलता के विनाशक और सामर्थ्य के संवर्धक हैं।
वह कुसंस्कारों के शत्रु और चरित्र के शिल्पकार हैं।
और जब शिक्षक अपनी इस शक्ति को पहचानकर कार्य करते हैं, तब उनकी कक्षा केवल कक्षा नहीं रहती—
वह राष्ट्र-निर्माण की प्रयोगशाला बन जाती है।
लेखिका
उर्मिला देवी उर्मि

साहित्यकार
रायपुर छत्तीसगढउर्मिला देवी उर्मि,
साहित्यकार, शिक्षाविद्,
मंच संचालिका।



















