DIET दुर्ग के ब्लूप्रिंट ट्रेनिंग कार्यक्रम में श्री बिसरा राम यादव और डॉ. श्वेता चौबे ने शिक्षकों को दिया प्रेरणा और नवाचार का मंत्र

0
33

शिक्षक को शिक्षक और छात्र दोनों के दृष्टिकोण से सोचना होगा: डॉ. श्वेता चौबे


दुर्ग

 जिला शिक्षा एवं प्रशिक्षण संस्थान (DIET) दुर्ग-अछोटी द्वारा आयोजित ब्लूप्रिंट ट्रेनिंग प्रोग्राम में शिक्षकों को प्रभावी शिक्षण, कक्षा प्रबंधन और नवाचार आधारित अध्यापन के गुर सिखाने वाली शासकीय इंजीनियरिंग कॉलेज रायपुर की रसायन शास्त्र विभागाध्यक्ष एवं प्राध्यापक डॉ. श्वेता चौबे को उनके उत्कृष्ट योगदान के लिए संस्थान ने अपनी कृतघ्नता  व्यक्त की

श्री बिसरा राम यादव, पूर्व राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ संचालक छत्तीसगढ़ के मुख्य आतिथ्य में आयोजित इस प्रशिक्षण कार्यक्रम में उन्होंने शिक्षकों को राष्ट्र निर्माण की प्रक्रिया में अपनी भूमिका को समझते हुए विद्यार्थियों के सर्वांगीण विकास हेतु समर्पित भाव से कार्य करने का संदेश दिया। उनके प्रेरक उद्बोधन ने उपस्थित शिक्षकों को शिक्षा के साथ संस्कारों और सामाजिक उत्तरदायित्व के महत्व का भी बोध कराया। हम को ये सुनुश्चित करने को कहा कि, कोई भी छात्र बेरोजगार न रहे, चाहे पुश्तैनी हुनर हो या तकनीकी कौशल हो, विद्यार्थी रोज़गार और स्वाभिमान के साथ जीवन पथ पर अग्रसर हों |

8 जून 2026 को आयोजित इस प्रशिक्षण कार्यक्रम में जिले भर से आए शिक्षकों ने भाग लिया। प्रशिक्षण के दौरान डॉ. चौबे ने केवल विषयगत ज्ञान ही साझा नहीं किया, बल्कि शिक्षण को अधिक प्रभावी, रोचक और विद्यार्थी-केंद्रित बनाने के अनेक व्यावहारिक उपाय भी बताए।

अपने व्याख्यान के दौरान डॉ. श्वेता चौबे ने शिक्षकों से संवादात्मक शैली में कहा कि माता-पिता के बाद यदि किसी का सबसे अधिक प्रभाव बच्चों के व्यक्तित्व पर पड़ता है, तो वह गुरु का होता है। उन्होंने कहा कि अक्सर देखा जाता है कि जब अभिभावक घर पर बच्चों को पढ़ाते हैं या किसी विषय पर समझाने का प्रयास करते हैं, तो बच्चे तुरंत कहते हैं— “मैडम ने हमें तो ऐसा बताया है” या “सर ने ऐसा नहीं पढ़ाया है”। यह दर्शाता है कि विद्यार्थियों के मन में अपने शिक्षक के प्रति कितना गहरा विश्वास और सम्मान होता है। इसलिए प्रत्येक शिक्षक का दायित्व है कि वह अपने आचरण, व्यवहार और व्यक्तित्व से विद्यार्थियों के सामने एक आदर्श उदाहरण प्रस्तुत करे।

उन्होंने आगे कहा कि,

प्रभावी शिक्षण केवल विषय-वस्तु के ज्ञान तक सीमित नहीं है, बल्कि उसे प्रस्तुत करने की कला भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। ब्लैकबोर्ड टीचिंग आज भी शिक्षण का सबसे प्रभावी माध्यम है, बशर्ते उसका सुव्यवस्थित और योजनाबद्ध उपयोग किया जाए। उन्होंने शिक्षकों को प्रत्येक अध्याय के लिए पूर्व तैयारी के साथ लेसन प्लान तैयार करने, कक्षा में स्पष्ट एवं व्यवस्थित लेखन करने तथा विषय को चरणबद्ध तरीके से प्रस्तुत करने की सलाह दी।

डॉ. चौबे ने कहा कि,

शिक्षक को समय-समय पर स्वयं को विद्यार्थियों के स्तर पर रखकर सोचना चाहिए। जब शिक्षक छात्र की दृष्टि से किसी विषय को समझने का प्रयास करता है, तभी उसे यह पता चल पाता है कि विद्यार्थियों को वास्तविक कठिनाई कहाँ आ रही है। इससे न केवल समस्याओं की पहचान आसान होती है, बल्कि शिक्षक और विद्यार्थियों के बीच बेहतर संवाद एवं विश्वास का संबंध भी विकसित होता है।

उन्होंने शिक्षकों को सलाह दी कि,

कक्षा का वातावरण सदैव खुशगवार, जीवंत और सहभागितापूर्ण होना चाहिए। यदि कक्षा का माहौल अत्यधिक औपचारिक, तनावपूर्ण या बोझिल होगा, तो विद्यार्थियों की रुचि कम हो जाएगी। इसके विपरीत यदि शिक्षण को रोचक गतिविधियों, प्रश्नोत्तर और संवाद के माध्यम से प्रस्तुत किया जाए तो सीखने की प्रक्रिया अधिक प्रभावी और आनंददायक बन जाती है।

व्यावहारिक सुझाव साझा करते हुए उन्होंने कहा कि,

प्रत्येक अध्याय से संबंधित चार्ट विद्यार्थियों से तैयार करवाए जाएँ और उन्हें कक्षा की दीवारों पर प्रदर्शित किया जाए। समय-समय पर किसी भी विद्यार्थी को यादृच्छिक रूप से चुनकर उन चार्टों के विषयों को समझाने के लिए कहा जाए। इससे विद्यार्थियों में आत्मविश्वास बढ़ेगा, प्रस्तुतीकरण कौशल विकसित होगा तथा सभी छात्र निरंतर अध्ययन के लिए प्रेरित रहेंगे। उन्होंने कहा कि जब विद्यार्थी स्वयं सीखने और सिखाने की प्रक्रिया का हिस्सा बनते हैं, तब शिक्षा वास्तव में प्रभावी और स्थायी बनती है।

अपने संबोधन में डॉ. चौबे ने शिक्षकों से कहा कि,

आज के विद्यार्थी केवल पुस्तकीय ज्ञान नहीं, बल्कि प्रेरणा, मार्गदर्शन और सकारात्मक वातावरण की भी अपेक्षा रखते हैं। उन्होंने कहा कि शिक्षक का दायित्व केवल पाठ्यक्रम पूरा करना नहीं है, बल्कि प्रत्येक विद्यार्थी की क्षमता को पहचानकर उसे आगे बढ़ाने का भी है। एक अच्छा शिक्षक वही है जो कक्षा में बैठे प्रत्येक विद्यार्थी को सीखने की प्रक्रिया से जोड़ सके।

उन्होंने शिक्षकों को सुझाव दिया कि,

विद्यार्थियों को केवल उत्तर बताने की बजाय उन्हें प्रश्न पूछने, तर्क करने और स्वयं समाधान खोजने के लिए प्रोत्साहित किया जाए। जब छात्र स्वयं सोचने लगते हैं, तब वास्तविक शिक्षा का उद्देश्य पूरा होता है। उन्होंने कहा कि कक्षा में भय नहीं, बल्कि जिज्ञासा का वातावरण होना चाहिए।

डॉ. चौबे ने अपने अनुभव साझा करते हुए बताया कि,

शिक्षण में छोटे-छोटे नवाचार भी बड़े परिणाम दे सकते हैं। समूह चर्चा, विषय आधारित गतिविधियां, प्रस्तुतीकरण, चार्ट निर्माण, मॉडल प्रदर्शन और सहपाठी शिक्षण जैसी गतिविधियां विद्यार्थियों की सहभागिता बढ़ाने में अत्यंत प्रभावी सिद्ध होती हैं।

उन्होंने समझाया कि,

प्रत्येक शिक्षक को समय के साथ स्वयं को भी निरंतर अद्यतन करते रहना चाहिए। नई शिक्षण तकनीकों, डिजिटल संसाधनों और नवाचारों को अपनाकर शिक्षा को अधिक प्रभावी बनाया जा सकता है। यदि शिक्षक सीखना बंद कर देता है, तो वह विद्यार्थियों को सीखने के लिए प्रेरित नहीं कर सकता।

डॉ. चौबे ने शिक्षकों को विद्यार्थियों की नियमित काउंसलिंग करने की भी सलाह दी। उन्होंने कहा कि,

कई बार विद्यार्थियों की शैक्षणिक कमजोरी का कारण पढ़ाई नहीं, बल्कि उनकी व्यक्तिगत, पारिवारिक, सामाजिक अथवा भावनात्मक समस्याएं होती हैं। ऐसे में शिक्षक को केवल अंक और प्रदर्शन नहीं देखना चाहिए, बल्कि विद्यार्थी के व्यवहार, मनोस्थिति और परिस्थितियों को भी समझने का प्रयास करना चाहिए।

उन्होंने ज्ञानवर्धन करते हुए यह बताया कि,

जब शिक्षक विद्यार्थियों से व्यक्तिगत स्तर पर संवाद स्थापित करते हैं, तो उन्हें उनकी वास्तविक चुनौतियों और आवश्यकताओं को समझने का अवसर मिलता है। इससे समस्याओं का समाधान अधिक संवेदनशील और प्रभावी ढंग से किया जा सकता है।

डॉ. चौबे ने विशेष रूप से इस बात पर जोर दिया कि,

काउंसलिंग के दौरान विद्यार्थियों द्वारा साझा की गई व्यक्तिगत जानकारियों, भावनाओं और पारिवारिक परिस्थितियों को गोपनीय रखा जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि किसी विद्यार्थी की निजी बातों को स्टाफ रूम की चर्चा या अनौपचारिक बातचीत का विषय नहीं बनाना चाहिए। शिक्षक को विद्यार्थियों के विश्वास का सम्मान करना चाहिए और उनकी व्यक्तिगत जानकारी का उपयोग केवल उनके हित, मार्गदर्शन और सकारात्मक विकास के लिए ही करना चाहिए।

उन्होंने कहा कि,

एक संवेदनशील शिक्षक केवल पढ़ाने वाला व्यक्ति नहीं होता, बल्कि वह मार्गदर्शक, सलाहकार और विश्वासपात्र भी होता है। जब विद्यार्थियों को यह विश्वास होता है कि उनकी बात को समझा जाएगा और गोपनीय रखा जाएगा, तब वे खुलकर अपनी समस्याएं साझा करते हैं और उनका समुचित समाधान संभव हो पाता है।

व्याख्यान के अंत में उन्होंने शिक्षकों से आह्वान किया कि,

वे अपने विद्यालयों और कक्षाओं को केवल अध्ययन का स्थान न बनाकर सीखने, सोचने, संवाद करने और व्यक्तित्व निर्माण का केंद्र बनाएं। उन्होंने कहा कि एक प्रेरित शिक्षक ही प्रेरित समाज और सशक्त राष्ट्र की आधारशिला रख सकता है।

कार्यक्रम का आयोजन प्राचार्य श्री पी.सी. मरकले के कुशल मार्गदर्शन में संपन्न हुआ। उनके नेतृत्व में प्रशिक्षण कार्यक्रम का सफल संचालन करते हुए शिक्षकों के व्यावसायिक कौशल संवर्धन पर विशेष ध्यान दिया गया।

प्रशिक्षण में विषय विशेषज्ञ के रूप में डॉ. शिशिर कना भट्टाचार्य, डॉ. नीलम दुबे, डॉ. वंदना सिंह, डॉ. हेमंत साहू, सहायक प्राध्यापक श्रीमती संध्या शर्मा एवं अन्य स्टाफ सदस्यों ने सहभागिता करते हुए प्रतिभागियों का मार्गदर्शन किया।

प्रशिक्षण के नोडल अधिकारी श्री सत्येंद्र शर्मा ने बताया कि,

दुर्ग जिले के पाटन, धमधा एवं दुर्ग विकासखंड से लगभग 180 वाणिज्य संकाय के व्याख्याता इस प्रशिक्षण में भाग ले रहे हैं। ब्लूम टैक्सोनॉमी के छह डोमेन आधारित प्रश्न निर्माण का यह प्रशिक्षण कक्षा 9वीं से 12वीं तक के विद्यार्थियों की अधिगम क्षमता एवं परीक्षा परिणामों में गुणात्मक सुधार लाने में सहायक सिद्ध होगा।

 

Technical Education Admission 2026(Polytechnic): बेटियों के लिए तकनीकी शिक्षा का सुनहरा अवसर: शासकीय कन्या पॉलिटेक्निक रायपुर में प्रवेश प्रक्रिया शुरू

भरथरी गायन से छाई नन्ही प्रतिभा, 10 साल की अरुणिमा ने फिर जीता दिल

चावल देखकर बताते थे किस्मत, अपनी किस्मत नहीं देख पाए, रेप केस में बदल गई बाबा की तकदीर !

शौर्य चक्र से सम्मानित हुए छत्तीसगढ़ पुलिस के दो जांबाज अधिकारी, वित्त मंत्री ने दी बधाई

छत्तीसगढ़ के क्रिकेटर आयुष पाण्डेय का इंडिया-ए टीम में चयन, उप मुख्यमंत्री ने दी शुभकामनाएं

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here